Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 (15:54 IST)
Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 (16:20 IST)
पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद मास की पूर्णिमा से होकर आश्विन माह की अमावस्या तक रहती है। इन 16 दिनों की अवधि में पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, पंचबलि कर्म और ब्राह्मण भोज कराने का विधान है। वर्ष 2026 में 16 श्राद्ध का यह पावन पर्व 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा। यदि आप किसी कारणवश नदी तट, मंदिर या तीर्थ स्थान पर नहीं जा पा रहे हैं, तो परेशान न हों। आप घर पर ही मध्याह्न (दोपहर) या अपराह्न काल में श्रद्धापूर्वक तर्पण कर सकते हैं।
तर्पण क्या है और इसके प्रकार
अर्थ: जल या तिल-मिश्रित जल अर्पित करके पितरों को तृप्त करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं।
तर्पण के 6 प्रकार: शास्त्रानुसार तर्पण छह प्रकार के होते हैं- 1. देव-तर्पण, 2. ऋषि-तर्पण, 3. दिव्य-मानव-तर्पण, 4. दिव्य-पितृ-तर्पण, 5. यम-तर्पण और 6. मनुष्य-पितृ-तर्पण।
घर पर तर्पण करने की चरणबद्ध विधि
1. आवश्यक सामग्री एकत्र करें
तर्पण प्रारंभ करने से पूर्व शुद्ध जल, कुशा का आसन, तांबे की बड़ी प्लेट (ताम्र पात्र), कच्चा दूध, गुलाब की पंखुड़ियां, कुशा, सुपारी, जौ, काले तिल, जनेऊ, सिक्का और चावल अपने पास रख लें।
2. शुद्धि, आचमन और संकल्प
कुशा के आसन पर बैठें और तीन बार आचमन करें: "ॐ केशवाय नमः, ॐ माधवाय नमः, ॐ गोविन्दाय नमः" बोलकर जल ग्रहण करें।
हाथ धोकर स्वयं पर जल छिड़कें। शिखा (चोटी) बांधकर माथे पर तिलक लगाएं और अनामिका उंगली में कुशा की अंगूठी (पवित्री) पहनें।
हाथ में जल, सुपारी, सिक्का व फूल लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण करते हुए संकल्प लें: "अथ् श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थ देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणम करिष्ये।।"
3. देव एवं ऋषि तर्पण (पूर्व दिशा)
पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे की थाली में जल, कच्चा दूध और गुलाब की पंखुड़ियां डालें।
हाथ में चावल लेकर देवताओं और ऋषियों का आह्वान करें।
दाएं हाथ की उंगलियों के अग्रभाग (देवतीर्थ) से जल अर्पित करते हुए देवताओं और ऋषियों का तर्पण करें।
4. दिव्य मनुष्य तर्पण (उत्तर दिशा)
उत्तर दिशा की ओर मुख करके पालथी मारकर बैठें। जनेऊ को गले में माला की तरह (कंठी) पहनें।
दोनों हथेलियों के मध्य से जल गिराकर दिव्य मनुष्यों का तर्पण करें।
5. पितृ तर्पण (दक्षिण दिशा)
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। जनेऊ को दाएं कंधे पर रखें (बाएं हाथ के नीचे ले जाएं)।
थाली में काले तिल छोड़ें और हाथ में तिल लेकर पितरों का आह्वान करें: "ॐ आगच्छन्तु में पितर इमम ग्रहन्तु जलान्जलिम।"
अंगूठे और तर्जनी के मध्य भाग (पितृ तीर्थ) से जल अर्पित करें।
6. मंत्र जप एवं जलांजलि
अपने गोत्र और पूर्वजों (पिता, दादा, परदादा) का नाम लेते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें:
"गोत्रे अस्मत्पितामह (पिता का नाम) वसुरूपत् तृप्यतमिदं तिलोदकम गंगा जलं वा तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः।"
इसी प्रकार तीन पीढ़ियों का नाम लेकर 3-3 बार जल अर्पित करें। यदि नाम याद न हों, तो रुद्र, विष्णु एवं ब्रह्मा जी का नाम स्मरण कर लें।
इसके उपरांत पूर्व दिशा में 16 बार, उत्तर दिशा में 7 बार और दक्षिण दिशा में 14 बार जलांजलि दें।
7. समापन एवं पंचबलि कर्म
तर्पण पूर्ण होने के बाद भगवान सूर्य को जल अर्पित करें।
कंडे (उपले) पर गुड़ और घी की धूप दें तथा पंचबलि (गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी और देव) के लिए भोजन का अंश निकालें।
अंत में हाथ में जल लेकर "ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः" बोलते हुए इस संपूर्ण कर्म को भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित कर दें।
इस प्रकार विधि-विधान से किए गए तर्पण से पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख, समृद्धि व आरोग्य का आशीर्वाद देते हैं।