Publish Date: Thu, 24 Sep 2026 (15:15 IST)
Updated Date: Thu, 24 Sep 2026 (15:20 IST)
Pitru Paksha 2026 : हिन्दू पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष (श्राद्ध महालय) का पावन काल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से आरंभ होता है। सनातन परंपरा में भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के कुल 16 दिनों को पितरों की तृप्ति और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना गया है। इस 16 दिवसीय महालय में पहला और अंतिम दिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत विशेष और फलदायी होता है।
मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध का विधान
शास्त्रों में श्राद्ध के लिए 16 तिथियों (पूर्णिमा से अमावस्या तक) का निर्धारण किया गया है। किसी भी परिजन का देवलोकगमन वर्ष के जिस भी पक्ष (कृष्ण या शुक्ल) की तिथि को हुआ हो, पितृ पक्ष में उसी तिथि पर उनके निमित्त श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है।
पूर्णिमा तिथि पर श्राद्ध की विशेषताएं और नियम
प्रोष्ठपदी पूर्णिमा और विशेष तर्पण:
जिन परिजनों का निधन पूर्णिमा तिथि को हुआ है, उनका श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा या आश्विन कृष्ण अमावस्या के दिन किया जाता है। इस तिथि को शास्त्रों में 'प्रोष्ठपदी पूर्णिमा' भी कहा गया है। हालांकि, यदि किसी स्त्री का निधन पूर्णिमा को हुआ हो, तो उनका श्राद्ध अष्टमी, द्वादशी या सर्वपितृ अमावस्या के दिन भी करने का विधान है।
ऋषि तर्पण का पर्व:
पूर्णिमा के श्राद्ध को 'ऋषि तर्पण' के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महान मंत्रदृष्टा ऋषि अगस्त्य के निमित्त जल और अन्न अर्पित किया जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, देवताओं और मुनियों की रक्षा हेतु ऋषि अगस्त्य ने संपूर्ण समुद्र का आचमन कर लिया था और दैत्यों का संहार किया था। उनके इसी उपकार के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए श्राद्ध पक्ष की शुरुआत में उनका तर्पण किया जाता है।
सत्यनारायण कथा और दान:
इस शुभ तिथि पर भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण व आयोजन करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। पूजन के उपरांत अधिक से अधिक लोगों में प्रसाद वितरित करना चाहिए।
उमा-महेश्वर व्रत: भाद्रपद पूर्णिमा के दिन भगवान शिव और माता पार्वती (उमा-महेश्वर) के पूजन एवं व्रत का विधान है। यह व्रत जीवन के समस्त संतापों को हरकर सुख-समृद्धि, उत्तम संतान और अखंड सौभाग्य प्रदान करता है।
पंचबलि कर्म और दान-पुण्य:
इस दिन पंचबलि का पालन करते हुए गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी और देवों के लिए अन्न-जल का अंश निकालना चाहिए। इसके पश्चात योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपनी सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो संध्या काल में किसी पवित्र नदी या सरोवर में दीपदान करना भी समान पुण्य फल देता है।
भाद्रपद पूर्णिमा का आध्यात्मिक महात्म्य
भाद्रपद पूर्णिमा न केवल पितरों के तर्पण का द्वार खोलती है, बल्कि यह श्री हरि विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की साधना और उमा-महेश्वर के पूजन का महापर्व भी है। विशेष रूप से महिलाओं द्वारा रखा जाने वाला यह व्रत परिवार में प्रखर बुद्धि, आरोग्य और सौभाग्य का विस्तार करता है।