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एसआईआर पर बंगाल का दृश्य डरावना

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अवधेश कुमार

, शुक्रवार, 12 दिसंबर 2025 (16:53 IST)
देश के नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर यानी विशेष मतदाता निरीक्षण अभियान चल रहा है। इनमें पश्चिम बंगाल का पूरा दृश्य भयभीत करने वाला है। जितनी बड़ी संख्या में वहां बीएलओ यानी बूथ लेवल ऑफिसर या मतदान केंद्र स्तर कर्मियों की मृत्यु या आत्महत्या की बातें उठाई जा रही है वह अकल्पनीय है। पूरी तृणमूल कांग्रेस और स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के विरुद्ध आक्रामक मोर्चा खोल दिया है। 
 
ममता ने आयोग को औपचारिक रूप से दो पत्र लिखे जिनमें इसे अनियोजित तरीके से आरंभ कर लोगों की जान जोखिम में डालने का आरोप लगाया तथा इसे तत्क्षण रोकने की भी मांग की। उनके पत्र में ऐसा न करने पर परिणाम के लिए उत्तरदायी होने की धमकी और चेतावनी दोनों थी।

बंगाल पहला राज्य है जहां बीएलओ के बैनर से मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय पर प्रदर्शन किया गया। 28 नवंबर को तृणमूल के प्रतिनिधिमंडल ने राजधानी दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात कर अपनी बातें रखीं। आयोग के हवाले से समाचार आया कि उन्होंने प्रतिनिधिमंडल से एस आई आर की प्रक्रिया में बाधा न डालने तथा दुष्प्रचार न करने का अनुरोध किया। 
 
आयोग ने तृणमूल प्रतिनिधिमंडल से कहा कि राजनीतिक बयान आपका अधिकार है लेकिन दुष्प्रचार कर समस्याएं पैदा करना उचित नहीं है। आयोग ने बीएलओ की मृत्यु या आत्महत्या के आरोपों से भी इनकार किया। यद्यपि कुछ मामलों में जांच की भी बात की। निश्चय ही हमारे आपके अंदर एस आई आर की पूरी प्रक्रिया तथा उसकी तात्कालिक परिणतियों को लेकर अनेक प्रश्न और संदेह पैदा होंगे। 
 
विचार करने की बात है की अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के दृश्य ऐसे क्यों नहीं है? हमने बिहार एस आई आर के दौरान राजनीतिक नेताओं के तेवर देखें, राहुल गांधी की 16 दिनों की वोट अधिकार यात्रा हुई, उच्चतम न्यायालय में नामी वकीलों ने इसके विरुद्ध बहस की किंतु प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी हुई।

इस समय भी उच्चतम न्यायालय में सुनवाई चल रही है। इसमें स्वयं मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि जब आप बिहार के बारे में बातें कर रहे थे तो हमें भी लगा कि कुछ गड़बड़ी हुई है और हमने वहां वॉलिंटियर्स नियुक्त किए?

आपने कहा कि लाखों के नाम कट रहे हैं, एक व्यक्ति नहीं आया जिसने अपना नाम काटने का आरोप लगाया। दूसरे, आपने कहा कि लोगों को प्रक्रिया की जानकारी नहीं है जबकि दिखाई दिया कि गांव के स्तरों पर भी लोगों को पूरी जानकारी थी। इसी तरह की टिप्पणी अन्य न्यायाधीशों की भी आई है। 
 
आधार कार्ड पर भी न्यायालय ने प्रश्न किया कि किसी विदेशी नागरिक के पास आधार कार्ड है तो क्या उसे मतदान का अधिकार दे दिया जाएगा? स्पष्ट है कि एसआईआर की पूरी सुनवाई और मॉनिटरिंग के बाद उच्चतम न्यायालय किन सच्चाइयों पर पहुंचा है। एस आई आर की प्रक्रिया ऐसी जटिल नहीं है जिसके दबाव में या परेशान होकर बीएलओ को आत्महत्या करनी पड़ी या उसकी मृत्यु हो जाए।

बिहार के अलावा अभी जिन राज्यों में हो रहे हैं वहां बी एल ओ लोगों को फोन करते हैं, पास जाते हैं, राजनीतिक पार्टियों के बीएलए बूथ लेवल एजेंट भी फोन करते हैं कि आपके पास फार्म पहुंचे नहीं पहुंचे आदि आदि और सहयोग से सारा काम चल रहा है। थोड़े बहुत परिश्रम के बाद कागजात भी हो जा रहा है। 
 
किंतु बंगाल की स्थिति भिन्न है। न भूलिए कि वहां एनआईए आतंकवाद के मामले में कार्रवाई करने जाती है तो उन पर हमले होते हैं और कार्रवाई के लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल लाना पड़ता है। बंगाल में एस आई आर की सूचना के साथ कुछ मोहल्ले खाली हो गए और पता चला कि सारे बांग्लादेशी घुसपैठियों थे। बांग्लादेश की सीमा पर भीड़ दिखी जो बता रहे हैं कि घुसपैठ कर आए, उनके आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र बने और उन्होंने मतदान भी किया। 
 
टीवी वीडियो में देखा जा सकता है कि कुछ लोग बीएसएफ से कह रहे हैं कि हमें उस ओर जाने दीजिए। बावजूद पूरी तृणमूल कांग्रेस स्वीकार करने को तैयार नहीं की कोई बांग्लादेशी घुसपैठिया उनके यहां हैं। उल्टे मुस्लिम मतदाताओं का नाम काटने का ही आरोप लगा रहे। यह एक पहलू बताने के लिए पर्याप्त है कि बंगाल में बीएलओ के साथ क्या हो रहा होगा। 
 
दो अन्य पहलू भी पर ध्यान दीजिए। चुनाव आयोग ने कहा है कि एसआईआर के दौरान कई राज्यों में विसंगतियां सामने आई है। मुंबई की मतदाता सूची में 10.64% यानी 11 लाख से अधिक डुप्लीकेट नाम पाए गए हैं। कुछ वार्डों में एक ही व्यक्ति का नाम 2 से लेकर 103 बार तक मिला। बंगाल का मामला कहीं अधिक बड़ा है।

चुनाव आयोग के अनुसार मतदाता सूची की तुलना पिछली एस आई आर (2002-2006) के रिकॉर्ड से करने पर लाखों नामों की विसंगति सामने आई। आयोग के पोर्टल पर गणना प्रपत्र अपलोड किए जाने के बाद मैपिंग प्रक्रिया में आते ही मिलान पुराने रिकॉर्ड से किया जाता है। 
 
मतदाता सूची में बड़ी संख्या में रिकॉर्ड मिसमैच चाहे वह मृत्यु रिकॉर्ड, निवास या पता बदलने, बाहर चले जाने या नाम के दोहरीकरण से हो चुनाव की पारदर्शिता को सीधे प्रभावित करने वाला पहलू है। बंगाल की सूची में 47 लाख ऐसे मतदाता सामने आए थे, जो अब दुनिया में नहीं हैं। इनमें 34 लाख ऐसे थे, जिनके आधार कार्ड भी बने थे।
 
पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची पर कई शोध हुए हैं। अगस्त 2025 में प्रकाशित शोध इलेक्टरल रोल इन्फ्लेशन इन वेस्ट बेंगाल: अ डेमोग्राफिक रिकंस्ट्रक्शन औफ लेजिटीमेट वोटर काउंट्स (2024) में विद्यु शेखर (एसपी जैन, मुंबई) और मिलन कुमार (आईआईएम विशाखापत्तनम)-- के अनुसार, 2024 की मतदाता सूची में करीब 1.04 करोड़ अतिरिक्त नाम हैं। यह कुल नाम का लगभग 13.69 प्रतिशत है।

वस्तुत: 2004 में राज्य में 4.74 करोड़ मतदाता थे। 1986 से 2006 के बीच जन्मे और 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले नए मतदाताओं को जोड़ने, प्रवासन, प्राकृतिक मृत्यु दर और उम्र के आधार पर अनुमान लगाया गया कि 2024 में पश्चिम बंगाल में वैध मतदाताओं की संख्या करीब 6.57 करोड़ होनी चाहिए थी, जबकि है, 7.61 करोड़। 
 
जन्म और मृत्यु दर बिल्कुल निश्चित है। उसके आधार पर कितने मतदाताओं की संख्या बढ़ सकती है इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। इस आंकड़े में कुछ लाख का ऊपर नीचे हो सकता है। यह सब सच है तो फिर बीएलओ के सामने कैसी परिस्थितियों तृणमूल कांग्रेस या अन्य लोग उत्पन्न कर रहे होंगे इसकी कल्पना करिए।

समाचार के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधियों से बातचीत में आयोग ने स्पष्ट कहा की वे मृत, स्थानांतरित और डुप्लिकेट मतदाताओं के संबंध में बीएलओ पर दबाव न डालें या धमकी नहीं दें। 
 
जब आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि जिनके या जिनके परिवारों के नाम 2002 की मतदाता सूची में है उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं तो असुरक्षा, आशंका और भय का माहौल क्यों? बिहार में भी नेताओं ने तनाव पैदा करने की कोशिश की लेकिन एक बीएलओ की मृत्यु नहीं हुई।

बिहार में लगभग 68.66 लाख लोगों के नाम काटे और लगभग 21.53 लाख नए नाम मतदाता सूची में शामिल हुए। वहां एस आई आर आरंभ होने के पूर्व मतदाताओं की संख्या सात करोड़ 89 लाख 69 हजार 844 थी जो घटकर 7.24 करोड़ से थोड़ा अधिक हो गई। 
 
पता चला कि इनमें 22 लाख 34 हजार 136 मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी थी और कुल 36 लाख 44 हजार 939 मतदाता स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके थे। इसके अलावा छह लाख 85 हजार मतदाताओं के नाम दो या उससे ज्यादा जगह थे। सारे हंगामों के बावजूद केवल 36,475 मतदाताओं ने नाम जोड़ने के लिए दावा पेश किया जबकि 2,17,049 मतदाताओं ने नाम हटाने के लिए आवेदन किए। 
 
मतदाता सूची जारी होने के बाद कोई ऐसा व्यक्ति नहीं आया जिसने कहा हो कि उसकी कोशिशें के बावजूद नाम नहीं जोड़ा गया। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ ,राजस्थान, महाराष्ट्र सब जगह एस आई आर चल रहा है, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी ने कुछ प्रश्न उठाएं किंतु वहां भी इस तरह के दृश्य नहीं है।

चुनाव आयोग अपने संवैधानिक दायित्व के तहत मतदाता सूची के शुद्धिकरण का काम कर रहा है ताकि दुनिया छोड़ गए या अन्यत्र चले जाने वालों के नाम हट जाए तथा कोई नाम एक ही जगह की सूची में हो। 
 
लंबे समय से मांग थी की अलग-अलग चुनावों के लिए अलग-अलग मतदाता सूचियां की जगह एक राष्ट्रीय स्तर की सूची हो। एस आई आर की प्रक्रिया के बाद भारत वह लक्ष्य भी प्राप्त कर सकता है। बंगाल से आ रहे दृश्य बता रहे हैं कि सत्ता पाने और बनाए रखने के लिए राजनीतिक पार्टियों ने किस तरह मतदाता सूची को दूषित किया हुआ है।
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

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