Publish Date: Mon, 12 Aug 2024 (13:54 IST)
Updated Date: Mon, 12 Aug 2024 (14:20 IST)
बजे ढ़ोल फिर ढम-ढम-ढम,
विश्व पटल पर चमके हम।
पहले तो हम विश्व गुरु थे,
फिर गुरुता हो गई विलीन।
आपस के ही झगड़ों में हम,
होते रहे दिनों दिन क्षीण।
और हमारी मरी आत्मा,
सहते-सहते जुल्म-सितम।
खोया अपना स्वाभिमान था,
मिली आबरू मिट्टी में।
शोणित जमकर बरफ हो गया,
नहीं बचा दम हड्डी में।
हमें लुटेरे लूट ले गए,
बैठे रहे निट्ठले हम।
इसी बीच में कुछ लोगों में,
जाग उठा था स्वाभिमान।
सोया था जो सदियों-सदियों,
खड़ा हुआ उठ, हिंदुस्तान।
हमने आज़ाई पाने को,
पूरी तरह लगा दी दम।
आखिर भागे दुश्मन डरकर,
देश ने आज़ादी पाई।
पूरी तरह गुलामी की पर,
आदत छूट नहीं पाई।
और उसी आदत के कारण,
नहीं चल सके ढंग से हम।
लेकिन एक समय आया जब,
हमने जग को दिखलाया।
विश्व गुरु बनने को भारत,
फिर रस्ते पर बढ़ आया।
उसी राह पर हम सबके ही,
तेजी से बढ़ चले कदम।
विश्व गुरु बनकर रहना हैं,
बात नहीं अब दो मत की।
धाक जमी है अब दुनिया में,
देश हमारे भारत की।
सुंदर से सुंदरतर होकर,
होना हमको सुंदरतम।
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