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रक्षा बंधन पर नारली पूर्णिमा क्यों मनाया जाता है, जानिए परंपरा और पूजा विधि

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Narali Purnima
समुद्र की लहरों और आस्था का पावन संगम है 'नारली पूर्णिमा'। महाराष्ट्र, कोंकण और संपूर्ण दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों में श्रावण पूर्णिमा के दिन इस पर्व को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। इसी दिन रक्षा बंधन का पर्व भी रहता है। चलिए जानते हैं शुभ तिथि मुहूर्त, पूजा की अनूठी विधि और परंपराएं।
 

शुभ मुहूर्त (2026)

पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 27 अगस्त 2026, प्रातः 09:08 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 28 अगस्त 2026, प्रातः 09:48 बजे
मुख्य पर्व तिथि: 28 अगस्त 2026 (शुक्रवार)
 

क्यों मनाया जाता है यह पर्व?

वरुण और इंद्र देव का पूजन: इस दिन वर्षा के देवता इंद्र और जल/समुद्र के स्वामी वरुण देव की विशेष आराधना की जाती है।
मछुआरों का मुख्य त्योहार: मानसून के दौरान समुद्र में जाने पर रोक होती है। नारली पूर्णिमा से मछुआरे वरुण देव की पूजा करके पुनः मछली पकड़ने की शुरुआत करते हैं।
समुद्र देव से सुरक्षा की प्रार्थना: समुद्र देव को शांत रखने और जल यात्राओं के दौरान किसी भी अनहोनी या आपदा से रक्षा के लिए यह अनुष्ठान किया जाता है।
 

पूजा की अनूठी विधि

नारियल का श्रृंगार: एक साबुत नारियल को पीले वस्त्र में लपेटकर, केले के पत्तों पर सजाया जाता है।
शोभायात्रा: गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों के साथ इस सुसज्जित नारियल को जुलूस के रूप में समुद्र तट तक ले जाया जाता है।
समुद्र में अर्पण: नारियल की शिखा को समुद्र की ओर रखकर वैदिक मंत्रों के साथ पूजा की जाती है और फिर नारियल को समुद्र देव को अर्पित कर दिया जाता है।
रक्षा की प्रार्थना: धूप-दीप जलाकर 'हे वरुणदेव! अपने रौद्र रूप से हमारी रक्षा करें और अपनी कृपा बनाए रखें'—ऐसी प्रार्थना की जाती है।
 

नारली पूर्णिमा से जुड़ी अन्य खास परंपराएँ

जनेऊ बदलना (अवित्तम): इस दिन जनेऊधारी अपनी पुरानी जनेऊ बदलकर नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं, इसलिए इसे 'अवित्तम', 'श्रावणी' या 'ऋषि तर्पण' भी कहा जाता है।
फलाहार व्रत: महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण इस दिन विशेष उपाकर्म अनुष्ठान करते हैं और व्रत के दौरान फलाहार के रूप में मुख्य रूप से नारियल का ही सेवन करते हैं।
प्रकृति का आभार: प्रकृति और पर्यावरण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए इस दिन सामूहिक रूप से वृक्षारोपण भी किया जाता है।

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