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लंका को जला कर क्यों पछताए थे हनुमानजी?

अनिरुद्ध जोशी
महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण में उल्लेख मिलता है 'हनुमानजी ने जब रावण की लंका जलाई तो उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ, क्योंकि हनुमानजी एकादश रुद्र के अवतार हैं।
 
 
रावण ने अपने दस सिरों को काटकर महामृत्युंजय की आराधना की थी। लेकिन ग्यारहवां रुद्र हमेशा असंतुष्ट ही रहा और यही रुद्र त्रेता युग में हनुमान के रूप में अवतरित हुआ। हनुमानजी का अवतार ही दरअसल रावण के विनाश के लिए भगवान श्रीराम के सहायक के रूप में हुआ था।
 
 
जब हनुमानजी ने रावण की लंका जला दी तो उनका मन कई उलझनों में था। वे अपने किए पर कभी पश्चाताप कर रहे थे। वाल्मीकि रामायण में श्लोक है 'यदि दग्धात्वियं सर्वानूनमार्यापि जानकी। दग्धा तेन मया भर्तुहतमकार्यजानता।'

अर्थात सारी लंका जल गई तो निश्चित रूप से जानकी भी उसमें जल गई होंगी। ऐसा करके मैंने निश्चित रूप से अपने स्वामी का बहुत बड़ा अहित कर दिया है। भगवान राम ने तो मुझे लंका इसलिए भेजा था कि मैं सीता का पता लगाकर लौटूंगा, लेकिन मैंने तो यहां कुछ और ही कर दिया। जब सीता ही नहीं रहीं तो राम भला कैसे जी पाएंगे। फिर सुग्रीव-राम की मैत्री के मायने क्या रह जाएंगे।
 
 
हनुमान जी यह भी भूल गए कि जिसने थोड़ी देर पूर्व उन्हें अजर-अमर होने का आशीर्वाद दिया था, वे जनकनंदनी भला आग की भेंट कैसे चढ़ सकती हैं? 'अजर- अमर गुण निधि सुत होहू, करहिं सदा रघुनायक छोहू' यही वजह थी कि जवालामुखी से घिरे होने के बावजूद हनुमानजी की सेहत पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं था।
 
 
हनुमानजी को आग की लपटों में देख, सीता जी ने भगवान शिव से प्रश्न किया किया कि अग्नि का हनुमानजी पर प्रभाव क्यों नही पढ़ रहा? तब भगवान शिव बोले कि हनुमान रुद्र के अवतार हैं। 'ताकर दूत अनल जेहि सिरजा, जरा न सो तेहि कारन गिरजा' रामायण में कथा आती है कि हनुमानजी ने लंका के सभी घर जला दिए लेकिन विभीषण का घर नहीं जलाया। 'जारा नगर निमिष इक माहिं, एक विभीषण कर गृह नाहिं।
 

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