ganesh chaturthi

प्रवासी कविता : मुसाफिरखाना

Webdunia
-हरनारायण शुक्ला
 
आना-जाना लगा हुआ है, यह है मुसाफिरखाना,
थोड़ी देर यहां रुकना है, फिर है सबको जाना।
 
गठरी रखकर सीधा कर लूं, थोड़ा अपना पांव,
सात कोस हूं चलकर आया, छूटा मेरा गांव।
 
मेरे जैसे कई मुसाफिर आते हैं, फिर जाते हैं,
स्थायी रहने नहीं, बस थोड़ा रहकर जाते हैं।
 
तरह-तरह के लोग यहां हैं, कई तरह के वेश,
यहां से जब मैं कूच करूंगा, रहेगा बस अवशेष।
 
चलते बनूं मैं अपना रस्ता, छोड़ मुसाफिरखाना,
लंबा सफर है मेरा यह, देखें कब होगा फिर आना।
 

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

नवीनतम

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वैश्विक मंच पर बढ़ायी भारत की प्रतिष्ठा और मान-सम्मान

नया भारत, नई उड़ान: मोदी युग में आत्मविश्वास का नया शिखर

17 सितंबर जन्मदिन पर विशेष: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में 25 दिलचस्प बातें

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

हिंदी दिवस विशेष: जानिए कैसे हिंदी राष्ट्रभाषा के गौरव से वंचित रह गई?

अगला लेख