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मध्य-पूर्व के देशों से भारत की बढ़ती घनिष्ठता

शरद सिंगी
रविवार, 11 फ़रवरी 2018 (17:23 IST)
प्रधानमंत्री मोदी इस समय मध्य-पूर्व के 3 देशों की यात्रा पर हैं। आज (रविवार को) वे दुबई में 'विश्व प्रशासन' के 6ठे शिखर सम्मेलन को संबोधित करेंगे। इस सम्मेलन में प्रशासन के क्षेत्र, भविष्य की चुनौतियों, प्रौद्योगिकी एवं प्रक्रियाओं पर चर्चा होगी। उसके बाद वे और भी कई आधिकारिक आयोजनों और भारतीय समुदाय के साथ विविध कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे।


मोदी द्वारा एक ही पखवाड़े में विश्व के 2 प्रमुख गैरराजनीतिक सम्मेलनों को संबोधित किया जाना संसार में उनके और भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है। इस संबोधन के लिए निमंत्रण उन्हें यूएई सरकार ने दिया था। गौरतलब है कि यूएई के साथ भारत के वर्षों से अच्छे संबंध होने के बावजूद जो गर्माहट वर्तमान प्रधानमंत्री के कार्यकाल में आई है, वह अभूतपूर्व है।

4 वर्ष के कार्यकाल में उनकी यह दूसरी यूएई यात्रा है, वहीं यूएई के युवराज भी इतने ही समय में भारत की 2 बार यात्रा कर चुके हैं। पाठकों को स्मरण होगा कि ये युवराज गत वर्ष गणतंत्र दिवस पर भारत में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों पक्षों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग और अधिक मजबूत होगा।

भारत जहां अपनी ऊर्जा की जरूरतों को सुरक्षित करना चाहेगा, वहीं यूएई रक्षा उपकरण निर्माण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (सूचना प्रौद्योगिकी) आदि क्षेत्रों में भारत का सहयोग चाहेगा। कहना न होगा कि इस यात्रा में रिश्तों के और अधिक गहरे होने की बात तो होगी ही किंतु अब मोदी सरकार पिछले समझौतों को अमलीजामा पहनाने में संलग्न है।

यूएई द्वारा पहले घोषित 75 बिलियन डॉलर का निवेश भारत में लाने का अब उचित समय है। चुनाव के पहले मोदी सरकार चाहती है कि जो समझौते हुए हैं, वे अब ग्राउंड पर भी दिखने लगें। निवेश के आने के साथ रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी, जो आज सरकार की प्राथमिकता है। यूएई आने से पहले मोदी ने फिलीस्तीन की यात्रा पूरी की।

यह यात्रा भी ऐतिहासिक रही। इसराइल की तरह यह भी किसी भारतीय प्रधानमंत्री की प्रथम यात्रा थी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह यात्रा मध्य-पूर्व में कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए थी, जो मोदी सरकार का एक विशिष्ट अंदाज है।

जब मोदी ने जुलाई 2017 में इसराइल की यात्रा की थी तब उन्होंने फिलीस्तीन की यात्रा नहीं की थी। यानी संकेत साफ दिया था कि भारत, फिलीस्तीन और इसराइल के रिश्तों को एक ही तराजू में नहीं तौलता। यह स्पष्ट कर दिया गया कि भारत वर्षों से फिलीस्तीन की जनता और उनकी समस्याओं के साथ है किंतु इसराइल के साथ भारत के रिश्ते स्वतंत्र हैं अर्थात किसी अन्य देश और उसकी समस्या से बंधे हुए नहीं हैं।

इसी तरह जब वे फिलीस्तीन की यात्रा पर गए तो उन्होंने वहां के नेतृत्व और जनता के साथ अपनी पारस्परिक एकजुटता का पुन: भरोसा दिलाया किंतु इसराइल को बीच में नहीं लाए। स्मरण रहे कि पिछले वर्ष दिसंबर में फिलीस्तीन के पाकिस्तान में पदस्थ राजदूत वालिद अबू अली जब फिलीस्तीन के समर्थन में आयोजित एक रैली में आतंकी हाफिज सईद के साथ स्टेज पर दिखाई दिए तो भारत की आपत्ति के तुरंत बाद फिलीस्तीन ने खेद जताते हुए सजास्वरूप अपने राजदूत को पाकिस्तान से तुरंत वापस बुला लिया था।

तब पाकिस्तान भी, जो फिलीस्तीन के साथ अपने रिश्तों को बेहद नजदीकी समझता था, भारत के इस कूटनीतिक सामर्थ्य को देख अचंभित रह गया था। स्मरण रहे, इसराइल के साथ बढ़ते संबंधों के बावजूद भारत ने यरुशलम के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र संघ में फिलीस्तीन का साथ दिया था। वह भी पड़ोसियों के लिए कम हैरानीभरा नहीं था। भारत यदि इसी तरह तनावग्रस्त राष्ट्रों के बीच संतुलन बनाने में कामयाब होता है तो निश्चित ही वह एक शांति सेतु निर्माता और मध्यस्थ के रूप में काम कर सकता है।

यह इसलिए कि फिलीस्तीन ने अपनी समस्याओं के लिए अमेरिका एवं अन्य विश्व शक्तियों पर भरोसा करना छोड़ दिया है। भारत का दर्शन हमेशा शांति, मैत्री, सद्भावना और 'विश्व एक परिवार' का रहा है, जो विश्व के संज्ञान में है। अत: भारत यदि इसी तरह शांति के प्रयास करता रहता है तो उसे सराहना ही मिलेगी, क्योंकि स्वहितनिरपेक्ष और कपटरहित प्रयास कभी कलंकित नहीं होते!

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