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बाड़ा

गिरीश पांडेय
हर महानगर की छाती पर कुछ बाड़े चिपके रहते हैं—सबसे पॉश मोहल्लों से सटे, लेकिन उनसे कोसों दूर। एक तरफ़ बहुमंजिला अपार्टमेंट्स और विलाएं, जहां सुख-सुविधाएं बरसती हैं; दूसरी तरफ़ बाड़े, जहां जीवन नर्क से भी बदतर है—पशु-समान, या उससे भी नीचे।
 
पॉश इलाके के लोग इन बाड़ों के बिना जी नहीं सकते। नौकरानी, ड्राइवर, गार्डनर, चौकीदार—सबकी आपूर्ति इन्हीं बस्तियों से होती है। कभी-कभी तो किसी सम्मानित पेशे का संघर्षरत इंसान भी इन बाड़ों में ठिकाना बनाता है। लोकलाज के कारण पता वही बताता है—विधायक निवास के पास, या कोई फैंसी कॉलोनी।
 
यह कहानी ऐसे ही एक बाड़े में रहने वाले—मेरे मित्र सुरेश की। सुरेश रीवा (मध्य प्रदेश) के थे, ब्राह्मण परिवार से, लेकिन परिचय में खुद को इलाहाबाद का बताते थे। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए के बाद भोपाल आए थे—पत्रकारिता करने। एक स्थानीय अखबार में डेस्क पर काम करते थे।
 
उन दिनों मैं भी भोपाल के दैनिक जागरण में नया-नया जुड़ा था। दोनों दफ्तर महाराणा प्रताप कॉम्प्लेक्स के प्रेस परिसर में पास-पास थे। डेस्क की टाइमिंग एक जैसी। चाय-पान की दुकान पर अक्सर मुलाकात हो जाती थी। मैं भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पढ़ा था और उत्तर प्रदेश से (गोरखपुर) था। वह भी खुद को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से बताते थे। लिहाजा बातचीत धीरे धीरे मित्रता में बदल गई।
 
वे बार-बार कहते, 'किसी दिन घर चलो।' पता बताते—विधायक निवास के पास। एक छुट्टी का दिन। झमाझम बारिश। मन हुआ चलें। वे ले गए। विधायक निवास से लगी झुग्गी-बस्ती में उनकी छोटी-सी झुग्गी। फूस की छत, टूटी-फूटी दीवारें। फिर भी आदर-सत्कार पूरा। बताया, 'छोटा भाई भी साथ है—किसी के यहां सिक्योरिटी गार्ड लगा दिया। बस, जीवन चल रहा है।'
 
रात हुई, बारिश और तेज। छत से पानी टपकने लगा—चारों तरफ़। कोई कोना सूखा नहीं। आखिरकार चारपाई पर चटाई बिछाई, उसके नीचे बिस्तर लगाया और भीगते-तरबतर रात काटी। एक पत्रकार, जो रोज़ समाज की सच्चाई लिखता था, खुद उसी सच्चाई के बीच जी रहा था—बिना किसी शिकवा-शिकायत के।
 
उस संघर्ष की याद आज भी कचोटती है। हाल ही में पुराने पत्र निकाले तो उनका एक खत मिला—दिल्ली जाते वक्त मेरे लिए लिखा, किसी दिल्लीवासी मित्र का पता। उसके बाद संपर्क टूट गया। पता नहीं, आज वे कहां हैं—किस बाड़े से निकलकर किस ऊंचाई पर होंगे। यह सिर्फ़ सुरेश की कहानी नहीं—हजारों ऐसे लोगों की है, जो शहर की चमक के नीचे दबे रहते हैं और जिनके बिना वो चमक फीकी पड़ जाती है।

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