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लोहड़ी की तरह ईरान में मनाया जाता है चहारशंबे सूरी

अनिरुद्ध जोशी
एक समय था जबकि ईरान के कुछ हिस्से भारतखंड में आते थे। यहां पर आर्यों के समुदाय आबाद थे। आर्यों का अग्नि से बहुत संबंध रहा है। ऋग्वेद में इंद्र के बाद अग्नि से संबंधित बहुत सारे श्लोक हैं। अखंड भारत में मकर संक्रांति को ही अलग अलग रूप में मनाया जाता है। पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाते हैं और लोहड़़ी की तरह ही ईरान में मनाया जाता है चहारशंबे सूरी।
 
लोहड़ी : लोहड़ी को बसंत के आगमन के साथ 13 जनवरी, पौष महीने की आखरी रात को मनाया जाता है। इसके अगले दिन माघ महीने की सक्रांति को माघी के रूप में मनाया जाता है। वैसाखी त्योहार की तरह लोहड़ी का सबंध भी पंजाब के गांव, फसल और मौसम से है। इस दिन से मूली और गन्ने की फसल बोई जाती है। इससे पहले रबी की फसल काटकर घर में रख ली जाती है। खेतों में सरसों के फूल लहराते दिखाई देते हैं।
 
लोहड़ी की संध्या को लोग लकड़ी जलाकर अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग में रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति देते हैं। अग्नि की परिक्रमा करते और आग के चारों ओर बैठकर लोग आग सेंकते हैं। इस दौरान रेवड़ी, खील, गज्जक, मक्का खाने का आनंद लेते हैं।
चहार-शंबे सूरी : ईरान में भी नववर्ष का त्योहार इसी तरह मनाते हैं। यह त्योहार भी लोहड़ी से ही प्रेरित है जिसमें आग जलाकर मेवे अर्पित किए जाते हैं। मसलन, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में मनाई जाने वाली लोहड़ी और ईरान का चहार-शंबे सूरी बिल्कुल एक जैसे त्योहार हैं। इसे ईरानी पारसियों या प्राचीन ईरान का उत्सव मानते हैं। यह त्योहार नौरोज या नवरोज के एक दिन पहले मनाया जाता है। इसमें एडिशनल यह है कि कुछ जगहों पर आग पर चलने का करतब भी दिखाया जाता है।
 
नवरोज़ : नौरोज़ या नवरोज़, ईरानी नववर्ष का नाम है, जिससे पारसी धर्म के लोग मनाते हैं, परंतु ईरान के शियाओं भी इस त्योहार को इसलिए मनाते हैं क्योंकि यह उनकी प्राचीन संस्कृति का प्रमुख त्योहार है। यह मूलत: प्रकृति प्रेम का उत्सव है। प्राचीन परंपराओं व संस्कारों के साथ नौरोज का उत्सव न केवल ईरान ही में ही नहीं बल्कि कुछ पड़ोसी देशों में भी मनाया जाता है। पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, काकेशस, काला सागर बेसिन और बाल्कन में इसे 3,000 से भी अधिक वर्षों से मनाया जाता है। यह ईरानी कैलेंडर के पहले महीने (फारवर्दिन) का पहला दिन भी है।

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