गुड़ की लैया नहीं मिली है, बहुत दिनों से खाने को। बचपन फिर बेताब हो रहा, जैसे वापस आने को। आम, बिही, जामुन पर चढ़कर, इतराते-बौराते थे। कच्चे पक्के कैसे भी फल, तोड़-तोड़ कर खाते थे। मन फिर करता बैठ तराने, किसी डाल पर गाने को। मन...