Publish Date: Mon, 23 Feb 2026 (16:45 IST)
Updated Date: Mon, 23 Feb 2026 (16:25 IST)
poem on the fire of Holika Dahan: होलिका दहन के पावन अवसर पर, बुराई के अंत और विश्वास की विजय को दर्शाती एक विशेष कविता...
होलिका दहन: अटूट विश्वास की विजय
जलाओ आज मन की कलुषता, अधर्म का अंत होने दो,
होलिका की इस पावन अग्नि में, ईर्ष्या-द्वेष को खोने दो।
भभक रही है ज्वाला देखो, सत्य की शक्ति दिखाने को,
आई है फिर एक पूर्णिमा, जग को राह बताने को।
अभिमानी था वो हिरण्यकश्यप, खुद को ही भगवान कहा,
किंतु भक्त प्रह्लाद के मन में, बस नारायण का नाम रहा।
बुआ होलिका चली जलाने, ओढ़ चुनरिया वरदान की,
भूल गई थी मर्यादा वो, प्रभु के न्याय-विधान की।
हवा चली कुछ ऐसी अद्भुत, दृश्य बड़ा ही न्यारा था,
अग्नि ने बस उसे जलाया, जो अधर्म का सहारा था।
चुनरी उड़ी भक्त के ऊपर, आंच न उसको आई थी,
होलिका जलकर राख हुई, पर भक्ति मुस्कुराई थी।
आओ हम भी आज जलाएं, भीतर का अंधियारा जो,
जला दें स्वार्थ, अहंकार और मन का वो बंटवारा जो।
होली की इस शुचि अग्नि में, संकल्प नया अब धारें हम,
मिटा के सारे बैर-भाव, इंसानियत को निखारें हम।
राख बने सब चिंताएं, खुशियों का नूतन भोर खिले,
होलिका दहन की अग्नि से, सबको सुख-समृद्धि मिले।
कविता का सार: यह कविता हमें याद दिलाती है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो (जैसे होलिका का वरदान), ईश्वर के प्रति सच्चा विश्वास और सच्चाई की जीत हमेशा निश्चित होती है।