Publish Date: Fri, 20 Feb 2026 (16:50 IST)
Updated Date: Fri, 20 Feb 2026 (16:46 IST)
Essay on the importance of Holika Ashtami: प्रस्तावना: होलाष्टक, होलिका दहन और धुलेंड़ी हिंदू धर्म के प्रमुख और सबसे रंगीन त्योहारों में से एक हैं। यह त्योहार न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में धूमधाम से मनाया जाता है। होली का पर्व न केवल रंगों और मस्ती का प्रतीक है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई की विजय और प्रेम, भाईचारे का संदेश भी देता है। होलाष्टक से लेकर होलिका दहन और फिर धुलेंड़ी तक, इन सभी रीतियों और परंपराओं के पीछे एक गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक सोच है।
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होलाष्टक का महत्व
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होलिका दहन का महत्व
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धुलेंड़ी का उत्सव
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निष्कर्ष
होलाष्टक का महत्व
होलाष्टक वह आठ दिन का समय है जो होली से पहले होता है। इन दिनों में आमलकी एकादशी और रंगभरी ग्यारस आती हैं, जो फाल्गुन शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है। इस समय को विशेष रूप से भक्ति और साधना का समय माना जाता है। यह वक्त मन को शुद्ध करने, पुराने तनावों और नकारात्मकताओं को छोड़ने, और मानसिक रूप से होली के त्योहार के लिए तैयार होने का होता है।
होलाष्टक के दौरान कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि करना मना होता है, क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है। लोग इन दिनों में अधिक से अधिक पूजा और उपासना करते हैं। साथ ही, यह समय होता है जब लोग अपने जीवन में नये संकल्प लेते हैं और धार्मिक कार्यों में लीन रहते हैं।
होलिका दहन का महत्व
होलिका दहन, होली से एक दिन पहले मनाया जाता है और इसे बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से होलिका नामक राक्षसी का पुतला जलाया जाता है।
होलिका दहन की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। यह कथा हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद से जुड़ी हुई है। हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी राक्षस था, जो अपने पुत्र प्रह्लाद के भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा को सहन नहीं कर सका। होलिका, जो उसकी बहन थी, को विशेष वरदान प्राप्त था कि वह आग में जल नहीं सकती थी। उसने प्रह्लाद को मारने के लिए उसे अपनी गोदी में लेकर आग में बैठने का प्रयास किया, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका जलकर राख हो गई।
इस घटना को हर साल होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है, जो यह संदेश देता है कि सत्य और अच्छाई हमेशा विजय प्राप्त करती हैं, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। लोग इस दिन अपने पुराने तनावों और नकारात्मक विचारों को जलाकर नए उत्साह के साथ जीवन जीने का संकल्प लेते हैं।
धुलेंड़ी का उत्सव
होलिका दहन के बाद अगले दिन, जो धुलेंड़ी के रूप में मनाया जाता है, यह होली के असली रंगों और मस्ती का प्रतीक है। धुलेंड़ी का दिन रंगों से भरा होता है। लोग एक-दूसरे पर रंग डालते हैं, गले मिलते हैं और खूब मस्ती करते हैं। यह दिन मिलनसारिता, भाईचारे और प्रेम का उत्सव है।
होलिका दहन के बाद, लोग रंगों से खेले जाते हैं और वातावरण में उत्साह और खुशी फैल जाती है। गुलाल, पानी के रंग और पिचकारियां होली के दिन की खासियत होती हैं। यह दिन समाज में द्वार-द्वार, गली-गली प्रेम और खुशी का संदेश फैलाने का होता है।
इसके अलावा, होली का पर्व प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करने का संदेश भी देता है, जिससे न केवल हमारी त्वचा को नुकसान नहीं होता, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
निष्कर्ष:
होलाष्टक, होलिका दहन और धुलेंड़ी का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और समाज में एकता, प्रेम और भाईचारे का संदेश भी फैलाता है। इन तीनों के माध्यम से हम बुराई पर अच्छाई की विजय, पुराने नकारात्मक विचारों का त्याग, और समाज में प्रेम और शांति की स्थापना की ओर अग्रसर होते हैं। होली के इस रंगीन पर्व के माध्यम से हम अपने जीवन को खुशहाल, सकारात्मक और प्रेमपूर्ण बना सकते हैं।
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