धक-धक-सी महकी सांसें हैं, मदहोशियां छाईं, झूमे पलाश मदमस्त सा, जामुनिया भी बौराई। मन-मयूरा नाचे ता धिक, आज पी के भंग तरंग, अंबर है लाल, गाल गुलाल, मस्तानियां छाईं। मनमोहना ने रंग दी, मोरी ये चुनरिया, फागुन के जैसी प्रीत भरे सारी उमरिया। घूंघट के पट से देखूं, होली...