Publish Date: Friday, 30 January 2026 (17:42 IST)
Updated Date: Friday, 30 January 2026 (01:44 IST)
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का एक फैसला सुर्खियों में बना हुआ है। हाईकोर्ट ने रेप के एक मामले में सजा बदलकर दुष्कर्म की कोशिश करने का फैसला सुनाया। रेप केस में सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि अगर घटना के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ तो इसे रेप नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बलात्कार का अपराध 'प्रवेश' पर आधारित है- चाहे वह कितना ही मामूली क्यों न हो। लेकिन जहां प्रवेश निर्णायक रूप से साबित न हो, फिर भी यौन संबंध बनाने के स्पष्ट प्रयास और इरादे के प्रमाण हों, वहां कानून बलात्कार के प्रयास के तहत सजा देता है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 16 फरवरी को कहा कि बिना प्रवेश (पेनेट्रेशन) के स्खलन (इजैकुलेशन) की स्थिति बलात्कार नहीं बल्कि बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आता है।
अदालत ने कहा कि पीड़िता ने अपने बयान के एक हिस्से में प्रवेश होने की बात कही, लेकिन बाद में यह भी कहा कि दोषी ने करीब 10 मिनट तक अपना निजी अंग उसकी योनि के ऊपर रखा था। इस विरोधाभास और मेडिकल जांच में हाइमन के सुरक्षित पाए जाने के आधार पर अदालत ने माना कि बलात्कार का प्रयास तो सिद्ध होता है, लेकिन पूर्ण बलात्कार साबित नहीं होता।
क्या था पूरा मामला
अभियोजन के मुताबिक 21 मई 2004 की घटना है। पीड़िता घर पर अकेली थी। आरोपी ने उससे दुकान चलने को कहा। पैसे मांगने पर आरोपी ने कथित रूप से उसका हाथ पकड़कर उसे जबरन अपने घर ले गया, जहां उसने अपने और पीड़िता के कपड़े उतारकर उसकी इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाया। इसके बाद उसे कमरे में बंद कर हाथ-पैर बांध दिए और मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। धमतरी जिले के अर्जुनी थाने में एफआईआर दर्ज हुई। जांच के बाद चार्जशीट मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, धमतरी के समक्ष पेश की गई और मामला रायपुर की सत्र अदालत को सौंपा गया।
क्या था निचली अदालत का फैसला
6 अप्रैल 2005 को ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को आईपीसी की धारा 376(1) के तहत 7 साल के कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। साथ ही धारा 342 के तहत 6 महीने की सजा भी दी गई। हाईकोर्ट ने बलात्कार की सजा को बदलकर बलात्कार के प्रयास में परिवर्तित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2013 संशोधन से पहले भी आईपीसी की धारा 375 के तहत 'हल्का सा भी प्रवेश' बलात्कार के लिए पर्याप्त था।
न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कहा कि पीड़िता के बयानों में प्रवेश को लेकर संदेह पैदा होता है। मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया और डॉक्टर ने आंशिक प्रवेश की संभावना तो जताई, पर बलात्कार पर स्पष्ट राय नहीं दी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ यूपी बनाम बाबूल नाथ सहित अन्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि पूर्ण प्रवेश, हाइमन का फटना या वीर्य स्खलन जरूरी नहीं है; हल्का सा प्रवेश भी पर्याप्त है। हालांकि, इस मामले में वास्तविक प्रवेश साबित न होने के कारण अदालत ने माना कि आरोपी के कृत्य बलात्कार की तैयारी से आगे बढ़कर प्रयास की श्रेणी में आते हैं। पीड़िता को जबरन कमरे में ले जाना, कपड़े उतारना और यौन कृत्य का प्रयास करना उसके इरादे को दर्शाता है।
अदालत ने धारा 376/511 आईपीसी के तहत आरोपी को दोषी ठहराते हुए 3 साल 6 महीने की कठोर कारावास और 200 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई। धारा 342 के तहत 6 महीने की सजा बरकरार रखी गई और दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी। साथ ही आरोपी को पहले बिताई गई हिरासत अवधि का लाभ (सेट-ऑफ) दिया गया और दो महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट में समर्पण करने का निर्देश दिया गया। Edited by : Sudhir Sharma