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बिहार में सवर्णों की नाराज़गी भुनाने का कांग्रेसी दांव?

Webdunia
गुरुवार, 20 सितम्बर 2018 (12:18 IST)
- मनीष शांडिल्य (बिहार से)
 
क़रीब एक साल से बिहार में प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष का पद खाली पड़ा था। मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यह ज़िम्मेदारी पूर्व मंत्री मदन मोहन झा को सौंप दी।

महागठबंधन के दौर में मदन मोहन झा नीतीश सरकार में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री थे। वे मूल रूप से दरभंगा ज़िले से आते हैं और कांग्रेस की राजनीति उन्हें विरासत में मिली है। उनके पिता दिवंगत नागेंद्र झा बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री रहने के साथ-साथ आठ बार विधायक भी रहे थे।
 
सामाजिक रूप से मदन मोहन झा का ताल्लुक़ सवर्ण तबक़े से हैं। वे मैथिल ब्राह्मण हैं। मदन मोहन झा के साथ-साथ कांग्रेस ने मंगलवार को सवर्ण तबक़े से ही आने वाले एक दूसरे नेता अखिलेश सिंह को प्रचार समिति की कमान सौंपी। ऐसे में इन दोनों नियुक्तियों की चर्चा इस बात को लेकर सबसे ज़्यादा हो रही है कि क्या कांग्रेस ने उस सवर्ण तबक़े को अपने साथ फिर से जोड़ने के लिए यह दांव चला है जो अभी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से नाराज़ बताया जाता है।
 
"पार्टी फ़ैसले का मेरे ब्राह्मण होने से कोई संबंध नहीं"
 
एससी-एसटी एक्ट, आरक्षण और प्रमोशन में आरक्षण जैसे सवालों पर सवर्ण तबक़े की नरेंद्र मोदी सरकार से कथित नाराज़गी की चर्चा में है।
 
ऐसे में क्या ये फ़ैसला इस नाराज़गी को अपने पक्ष में करने के लिए लिया गया है?
 
इसके जवाब में मदन मोहन झा कहते हैं,"कांग्रेस पार्टी जात-पात में यक़ीन नहीं करती है। मेरे चेहरे को जाति से जोड़कर देखना उचित नहीं है। लोगों को लगा होगा कि हम बहुत दिन से काम कर रहे हैं, पार्टी के वफ़ादार हैं, लोग मुझे स्वीकार करते हैं। इस कारण पार्टी ने मुझे अध्यक्ष बनाया। इस फ़ैसले का मेरे ब्राह्मण होने से कोई संबंध नहीं है।"
 
कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष के मुताबिक़, सिर्फ़ अगड़ी जातियों की नाराज़गी की बात नहीं है। केंद्र सरकार के काम के विरोध में सारी जाति के लोग हैं। जब लोग प्रताड़ित होते हैं तो जाति नहीं देखते हैं। सबकी मंशा सांप्रदायिक ताक़तों को हराना है।
 
वहीं भाजपा का कहना है कि सवर्ण तबक़े की नाराज़गी की बातें अफ़वाह हैं। कांग्रेस के मौजूदा हाल पर भाजपा प्रवक्ता संजय सिंह टाइगर शायराना अंदाज में कहते हैं, ''उम्र भर ग़ालिब भूल यही करता रहा, चेहरे पर धूल थी और आईना साफ़ करता रहा।"
 
वो कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी जब तक अपनी चाल, चेहरा और चरित्र नहीं बदलेगी तब तक उसे अध्यक्ष बदलने से कोई फ़ायदा नहीं है। विपक्षी पार्टियां चुनाव के पहले ही हार मान चुकी हैं। वे विकास के एजेंडे को भटकाना चाहती हैं।''
 
मगर बिहार में राजनीतिक हालात और सामाजिक समीकरण के लिहाज से मदन मोहन झा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के फ़ैसले को जानकार एक सूझ-बूझ भरा फ़ैसला मान रहे हैं।
 
जैसा कि राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन बताते हैं, "बिहार में सवर्ण ही एक ऐसा तबक़ा है जिसे कांग्रेस अपने बूते महागठबंधन के पक्ष में कर सकती है। बिहार के मतदाताओं के अन्य तीन वर्गों यानी कि पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का समर्थन जुटाने की ज़िम्मेदारी राजद और जीतन राम मांझी की पार्टी के हिस्से की बात है। सवर्ण वोटों में सेंध कांग्रेस पार्टी ही लगा सकती है जो कि अभी बहुत हद तक एनडीए के साथ है। दूसरी ओर सवर्ण वोट का ऐतिहासिक आकर्षण कांग्रेस के प्रति रहा है चूंकि कांग्रेस सवर्णों की पार्टी मानी जाती रही है।"
 
'दोहराई जाएगी 2015 का रणनीति'
महागठबंधन में कांग्रेस पार्टी सूबे की चालीस में से कितनी लोकसभा सीटों पर दावेदारी करेगी? नव नियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष ने इस सवाल का सीधा जवाब तो नहीं दिया, लेकिन उन्होंने कहा, "अभी हम बेवजह सीट कह दें। कम कह दें तो भी गए और ज़्यादा मांगें तो भी गए।"
 
वे आगे कहते हैं, "कौन पार्टी कितने और किस सीट से चुनाव लड़ेगी यह तय होने में अभी वक़्त लगेगा। अभी तो हमको यह ही नहीं पता है कि और कौन-कौन से दल हमारे साथ आ रहे हैं। सबकी मंशा सांप्रदायिक ताक़तों को हराना है। ऐसे में एक सीट कम या ज़्यादा, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा।''
 
हालांकि ये बातें कहते हुए मदन मोहन झा ने यह नहीं बताया कि और कौन-कौन से दल महागठबंधन में शामिल हो सकते हैं। वहीं महेंद्र सुमन का मानना है कि कांग्रेस पिछले विधानसभा चुनाव के ही रास्ते पर चलेगी।
 
वे कहते हैं, "2015 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने सवर्ण उम्मीदवारों को ज़्यादा टिकट दिए थे और इस रणनीति से उसे अच्छी कामयाबी भी मिली थी। उसकी यही रणनीति आने वाले आम चुनावों में भी रहेगी। कांग्रेस अपने हिस्से आने वाली आठ से दस सीटों में से ज़्यादातर सीटें सवर्ण उम्मीदवारों विशेषकर ब्राह्मण उम्मीदवारों को देगी।"

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