Publish Date: Fri, 02 May 2025 (15:47 IST)
Updated Date: Fri, 02 May 2025 (18:18 IST)
" तिरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था ",
- मजाज़ लखनवी
Hariyana Samachar: हरियाणा, एक ऐसा प्रदेश जिसकी पहचान वीर जवानों और कृषि प्रधान संस्कृति से है, अक्सर अपनी कुछ पुरानी सामाजिक मान्यताओं के लिए भी चर्चा में रहता है। इन्हीं में से एक है घूंघट प्रथा, जो सदियों से यहां की महिलाओं के जीवन का एक हिस्सा रही है। लेकिन अब, बदलाव की बयार बह रही है और इस बदलाव की अगुवाई कर रहे हैं गांवों के जागरूक लोग। ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला तोशाम उपमंडल के ढाणी बीरन गांव में लिया गया, जहां पूरे गांव ने एक स्वर में घूंघट प्रथा को अलविदा कह दिया।
कैसे हुई शुरुआत
यह सब तब शुरू हुआ जब उपायुक्त महावीर सिंह कौशिक गांव के रात्रि कार्यक्रम में पहुंचे। ग्रामीणों की समस्याएं सुनने के दौरान, जब सरपंच कविता देवी के पति राजबीर अपनी बात रख रहे थे, तो उपायुक्त ने उन्हें टोकते हुए सरपंच को आगे आने के लिए कहा। कुछ लोगों ने दबी जुबान में सरपंच के घूंघट और उनकी झिझक का जिक्र किया। इसी क्षण, उपायुक्त ने एक ऐसी पहल की नींव रखी जिसने पूरे गांव की सोच बदल दी। उन्होंने कहा कि यदि ग्रामीण पर्दा प्रथा को मिटाने का संकल्प लें और सरपंच घूंघट से बाहर आकर अपनी बात रखें, तो यह पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल कायम करेगा।
और ऐसे गांव के बुजुर्गों के आशीर्वाद से हुआ घूंघट प्रथा का अंत
उपायुक्त की यह बात गांव के लोगों के दिलों को छू गई। बुजुर्ग धर्मपाल आगे आए और भावुक शब्दों में कहा, "बेटी तो वह है जो हमारे घर पर आती है, हमारे घर को बढ़ाती है। हमने बेटी जन्मी है, वह अगलों का घर बढ़ाएगी। आज से हम यह प्रण लेते हैं कि किसी बहू-बेटी को यह नहीं कहेंगे कि घूंघट क्यों उतार रखा है...अगर कोई इसका विरोध करेगा तो उसके खिलाफ पंचायत कर उचित निर्णय लिया जाएगा।" उनकी बातों के समर्थन में चौपाल पर मौजूद हर व्यक्ति ने दोनों हाथ उठाकर अपनी सहमति जताई। और फिर वह ऐतिहासिक पल आया, जब गांव की सरपंच कविता देवी घूंघट की ओट से बाहर निकलीं। उन्होंने पूरे गांव में पर्दा प्रथा को समाप्त करने में अपना पूरा सहयोग देने का संकल्प लिया। वहां मौजूद गणमान्य लोगों और बुजुर्गों ने भी इस साहसिक पहल का समर्थन किया। बुजुर्गों ने माना कि बदलते समय के साथ समाज में कुछ बदलाव लाना अत्यंत आवश्यक है और यह घूंघट प्रथा अब प्रगति के रास्ते में एक बाधा बन चुकी है।
ढाणी बीरन गांव का यह फैसला सिर्फ एक गांव की महिलाओं के लिए ही आज़ादी का संदेश नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है। यह दिखाता है कि जब लोग एकजुट होकर किसी कुप्रथा को समाप्त करने का संकल्प लेते हैं, तो बदलाव निश्चित रूप से आता है। यह कहानी उन बेटियों और बहुओं के हौसले को बुलंद करेगी जो आज भी घूंघट की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं। यह उन्हें यह विश्वास दिलाएगी कि बदलाव संभव है और उनकी आज़ादी का सूरज ज़रूर उगेगा।
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