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क्या चेतन देवनागरी में अंग्रेज़ी उपन्यास लिख सकते हैं?

Webdunia
चेतन भगत के ख्याल पर हिन्दी प्रेमियों के विचार 
 
लेखक चेतन भगत का मानना है कि हिन्दी को आगे बढ़ाना है तो देवनागरी के स्थान पर रोमन को अपना लिया जाना चाहिए। हमने हिन्दी प्रेमियों से बात की और जानना चाहा कि वे क्या मानते हैं क्या यह भाषा की हत्या की साजिश है?


 

हिन्दी भाषा में अंगरेजी शब्दों का समावेश तो मान्य हो चुका है मगर लिपि को ही नकार देना क्या भाषा को समूल नष्ट करने की चेष्टा नहीं है?  क्या आपको भी लगता है कि हिन्दी अब रोमन में लिखना आंरभ कर देना चाहिए। 

 
क्षमा शर्मा / साहित्यकार :  एक ओर चेतन भगत हिन्दी अखबारों में छपने के लिए लालायित रहते हैं, दूसरी ओर वे देवनागरी के स्थान पर रोमन अपनाने की सलाह देते हैं। वे खुद क्यों नहीं देवनागरी को अपना लेते? वे अंग्रेजी आलेखों को हिन्दी में अनुवाद करके हिन्दी अखबारों में छपवाते हैं। दरअसल, हिन्दी को हिन्दी वाले ही ज्यादा मार रहे हैं। जब हिन्दी के सेमिनार होते हैं तो सवाल उठाए जाते हैं कि अन्य भाषाओं को इसमें स्थान दिया जाना चाहिए और दिया भी जाता है, लेकिन अन्य भाषाओं के कार्यक्रमों हिन्दी को कतई स्थान नहीं दिया जाता। 
 
चेन्नई से पांडिचेरी के दौरान मैंने जो भी बोर्ड देखे वे तमिल और अंग्रेजी में तो थे, लेकिन वहां हिन्दी कहीं नहीं दिखाई दे रही थी। यह दुखद है। आज जिस भाषा को 55 करोड़ लोग बोलते हैं साथ दुनिया की बड़ी-बड़ी हिन्दी में बाजार ढूंढ रही है, आज दुनिया हिन्दी पढ़ना चाहती है, ऐसे में चेतन भगत द्वारा रोमन अपनाने की बात कहना बिलकुल भी उचित नहीं है।  
 
आमतौर पर हिन्दी की कमजोरियों की बात की जाती है, लेकिन कमियां किस भाषा में नहीं हैं? कुछ कमजोरियों का यह मतलब तो नहीं कि हम पूरी भाषा या लिपि को ही नकार दें। महाश्वेता देवी ने भी कहा था कि वे हिन्दी की कृतज्ञ हैं क्योंकि उन्हें हिन्दी से ही ज्यादा लोकप्रियता मिली थी। हेमा मालिनी, रेखा जैसी दक्षिण की अभिनेत्रियों को भी हिन्दी फिल्मों में आने के बाद ही देशव्यापी पहचान मिली थी। 
 
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प्रियदर्शन / टीवी पत्रकार और लेखक:  चेतन भगत दरअसल भाषा को सिर्फ बाज़ार की चीज की तरह देखते हैं और हिंदीभाषियों को उपभोक्ता की तरह। अगर उन्हें यह समझ होती कि भाषा सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु नहीं होती, उसका स्मृति से, परंपरा से वास्ता होता है, वह अनुभव और कल्पना की भी भाषा होती है तो ऐसे सुझाव नहीं देते। क्या चेतन भगत देवनागरी में अपने अंग्रेज़ी उपन्यास लिख सकते हैं? अगर नहीं तो वे देवनागरी में लिखने वालों को रोमन में लिखने की सलाह क्यों दे रहे हैं? अंग्रेजी का दबदबा इसलिए नहीं है कि वह रोमन में लिखी जाती है, बल्कि इसलिए है कि वह इस देश में हुकूमत की भाषा है। इसलिए उसमें रोज़गार है और शान है और इसीलिए लोगों में अंग्रेज़ी सीखने या बोलने की ललक है। लेकिन वह एक संस्कृतिविहीन और स्मृतिविहीन भारत बना रही है जिसके स्टार लेखक चेतन भगत जैसे सतही उपन्यासकार ही हो सकते हैं।
 
 
ज्योति जैन/ कवयित्री : मेरा मानना है कि हिन्दी को देवनागरी में ही लिखना चाहिए। चेतन भगत का कहना है कि हिन्दी को बचाने के लिए रोमन हिन्दी का प्रयोग हो तो कोई हर्ज नहीं। लेकिन मुझे लगता है यदि हम चाहें,और कोशिश करें तो देवनागरी टाईप करना /लिखना सीख सकते हैं।

लेकिन विडम्बना यह है कि हमें अपनी संस्कृति, अपनी परम्पराएं और अब अपनी भाषा से भी विमुख करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। इतनी समृद्ध भाषा को कठिन कह कर उसे हाशिए पर डालने का षडयंत्र।

इसी के चलते मेरे कॉलेज के विद्यार्थी हिन्दी बारहखड़ी का क ख तक नहीं जानते। आज टेक्नोलॉजी इतनी उन्नत हो गई है कि देवनागरी को आराम से लिखा जा सकता है। बशर्ते आपकी नीयत हो।
 
तेजेन्द्र शर्मा/ वरिष्ठ कथाकार : हम सब जानते हैं कि अगले पांच सौ साल में रोमन लिपि कभी भी हिन्दी भाषा की आधिकारिक लिपि नहीं बन सकती।... चेतन भगत एक लेखक है और वो भी अंग्रेज़ी भाषा का लेखक है। उसके मन में एक बात उठी है तो आज के हालात को देख कर उठी है। वह देखता है कि भारत के महानगरों में और विदेश में बसे भारतवंशियों के बच्चे हिन्दी बोल तो लेते हैं मगर लिखना या पढ़ना उनसे छूटता जा रहा है। उसने अपने दिल को टटोला तो उसे रोमन लिपि एक विकल्प सुझाई दिया। इसमें ना तो कोई साज़िश है और ना ही कोई हत्या का प्रयास।
 
आप स्वयं और आपके बच्चे और आपके आसपास के युवा एक लम्बे अर्से से... कम से कम 15 वर्षों से अपने मोबाइल और लैपटॉप पर केवल रोमन लिपि में हिन्दी लिख रहे हैं। जब कम्प्यूटर में हिन्दी फ़ाण्ट की अराजकता फैली हुई थी तो हम सब को रोमन लिपि ही एक विकल्प के रूप में दिखाई दे रही थी और हम सबने उसे स्वीकार भी कर लिया था। बोलचाल की हिन्दी जैसे साहित्यिक हिन्दी से अलग है, ठीक वैसे ही हमारी युवा पीढ़ी के मन में हिन्दी को एक बोली के रूप में बचाए रखने के लिये यदि इस विकल्प के बारे में सोचा जाए तो क्या हर्ज है। अभी बात केवल सोचने तक सीमित है।
 
वर्ना आप सब और हम सब प्रण लें कि आज के बाद कभी भी अपने एस.एम.एस. आदि रोमन लिपि में नहीं भेजेंगे।


जनक पलटा / समाज सेविका :  किसी भाषा का अस्तित्व बनाए रखने के लिए उसकी लिपि का इस्तेमाल उस भाषा और व्याकरण के अनुसार उचित होना चाहिए परंतु अगर किसी को उस भाषा को लिखना नहीं आता और अगर कोई व्यक्ति रोमन लिपि में उस भाषा को आसानी से लिख पाता है तो इसे अपराध की तरह से नहीं देखा जाना चाहिए।

यूं किसी लिपि को खत्म कर देने के पक्ष में मैं भी नहीं हूं पर प्रयोग के स्तर पर अगर कोई रोमन में ही सहज महसूस करें तो हर्ज ही क्या है? 
 
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