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जब कलेक्ट्रेट में मुस्कराए प्रदर्शनकारी, डीएम और लंगूर ‘मटरू’ की स्नेहभरी मुलाकात

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हिमा अग्रवाल

, शनिवार, 14 फ़रवरी 2026 (20:20 IST)
Uttar Pradesh News: बागपत के कलेक्ट्रेट परिसर में उस दिन एक अनोखा दृश्य देखने को मिला, जब संयुक्त किसान मोर्चे के बैनर तले किसान चार श्रम संहिताओं औ अन्य मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे। नारों और ज्ञापन के बीच माहौल गंभीर था। तभी 2015 बैच की आईएएस अधिकारी, जिलाधिकारी अस्मिता लाल स्वयं किसानों के बीच उनकी समस्याएं सुनने पहुंच गईं। हल्के बादामी रंग की साड़ी में सादगी और आत्मीयता का सुंदर संगम डीएम साहिबा के व्यक्तित्व को निखार रहा था।
 
इसी बीच अचानक वहां एक लंगूर आ पहुंचा, उसने आकर डीएम साहिबा की साड़ी का पल्लू थाम लिया। पल भर को सब चौंक गए, लगा डीएम डर जाएंगी, उनकी सिक्योरिटी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई कि अब डांट पड़ेगी। लेकिन अगले ही क्षण डीएम बागपत द्वारा अप्रत्याशित कोमलता ओढ़ ली। लोगों ने मुस्कराते हुए कहा कि लगता है यह भी अपनी फरियाद लेकर आया है। वहीं किसान बोले 'आपके जाने के बाद ये जीव-जन्तु याद करेंगे' और वहां यह सुनकर ठहाका लग गया।

स्नेहभरी आवाज़ में पुकारा— नो, मटरू…

वह लंगूर कोई अनजान नहीं था। कलेक्ट्रेट के आसपास अक्सर दिखाई देने वाले इस चंचल मेहमान को सब प्यार से 'मटरू' कहते हैं। अस्मिता लाल ने भी स्नेहभरी आवाज़ में पुकारा— 'नो, मटरू…' और फिर उसके पास बैठ गईं। करीब पांच मिनट तक वह उसे दुलारती रहीं, जैसे किसी शरारती बच्चे को समझा रही हों। मटरू भी मानो उनकी बात समझ रहा था। किसानों के चेहरों पर अनायास मुस्कान तैर गई और धरने का तनावभरा माहौल सहजता में बदल गया।

पशुप्रेमी हैं डीएम लाल

कहा जाता है कि अस्मिता लाल जमीन से जुड़ी और मृदुभाषी अधिकारी हैं। उनका प्रशासनिक नेतृत्व और व्यवहारिक संवेदनशीलता बड़ी जटिलता को सरल बना सबके के बीच विश्वास पहची बन चुका है। इस IAS का पशु-प्रेम भी उनके व्यक्तित्व की खास पहचान है, इससे पहले वे स्ट्रीट डॉग्स के लिए 'पप्पी हाउस' और परिंदों के लिए आश्रय बनवाने की पहल कर चुकी हैं।
 
मटरू के साथ उनका यह स्नेहिल संवाद अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह दृश्य सिर्फ एक लंगूर और एक अधिकारी के बीच का क्षण नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन और करुणा की जीवंत मिसाल बन गया है। जिसे देखकर कहा जा सकता है कि  इंसानियत, जिम्मेदारी और प्रेम एक साथ मुस्करा रहें हैं।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 

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