Publish Date: Mon, 14 Sep 2026 (09:19 IST)
Updated Date: Mon, 14 Sep 2026 (15:22 IST)
हरतालिका तीज का पावन पर्व इस बार बेहद खास संयोग लेकर आ रहा है। लाला रामस्वरूप, कालनिर्णय, द्रिक पंचांग और एस्ट्रोसेज जैसे मुख्य पंचांगों की मानें, तो उदयातिथि के अनुसार यह व्रत 14 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। इस दिन सोमवार के साथ चतुर्थी का अद्भुत योग बन रहा है, जिसे शास्त्रों में अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है। हरतालिका तीज से जुड़ी हर अहम जानकारी—शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और पारण समय—बिल्कुल नए और सरल अंदाज में नीचे दी जा रही है:
पूजा के शुभ मुहूर्त (14 सितंबर 2026)
तृतीया तिथि 13 सितंबर को सुबह 07:08 बजे शुरू होगी और 14 सितंबर को सुबह 07:06 बजे समाप्त हो जाएगी।
प्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह 06:12 से 07:06 तक (तृतीया तिथि समाप्त होने से ठीक पहले)।
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:09 से 12:58 तक।
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:42 से 07:05 तक।
प्रदोष काल मुहूर्त: सूर्यास्त के तुरंत बाद (अगले 2 घंटे 24 मिनट तक)।
निशिथ काल (मध्यरात्रि) मुहूर्त: रात 12:11 से 12:57 तक।
ध्यान दें: स्थानीय सूर्योदय के समय के अनुसार पूजा के मुहूर्त में 2 से 5 मिनट का अंतर आ सकता है।
व्रत का पारण
हरतालिका तीज व्रत का पारण 15 सितंबर 2026, मंगलवार को सूर्योदय के पश्चात किया जाएगा।
तैयारी और स्थापना:
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काली मिट्टी या बालू से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की सुंदर मूर्तियां बनाएं।
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घर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में एक चौकी रखें, उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और जल से भरा कलश स्थापित कर मूर्तियों को विराजित करें।
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सामग्री में बेलपत्र, धतूरा, जनेऊ, आम के पत्ते, नारियल, फल-फूल और माता पार्वती के लिए पूरा सोलह श्रृंगार तैयार रखें।
पूजन एवं श्रृंगार:
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सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी की पूजा करें।
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इसके बाद शिव-पार्वती जी का जल और पंचामृत से अभिषेक करें।
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भोलेनाथ को प्रिय बेलपत्र और धतूरा चढ़ाएं तथा माता पार्वती को सोलह श्रृंगार अर्पित करके सिंदूर का दान करें।
कथा, आरती और रात्रि जागरण:
हरतालिका तीज की पावन व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
विधि-विधान से आरती करके भगवान को फल, खीर या पुए का भोग लगाएं।
इस व्रत में रात भर सोना वर्जित माना जाता है, इसलिए रात्रि जागरण कर 'ॐ नमः शिवाय' का निरंतर जाप और भजन-कीर्तन करें।
दान और पारण:
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अगले दिन (15 सितंबर) सुबह पुनः स्नान और संक्षिप्त पूजा करें।
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सुहाग की सामग्री किसी ब्राह्मणी या घर की बुजुर्ग सुहागिन महिला को आदरपूर्वक दान करें।
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अंत में मूर्तियों का पवित्र जल में विसर्जन करने के बाद ही अपना व्रत खोलें (पारण करें)।