Hanuman Chalisa

क्रांतिकारी योद्धा गुरु हरगोविंद सिंह महाराज का प्रकाश पर्व

Webdunia
शुक्रवार, 29 जून 2018 को सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह महाराज का प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। इस उपलक्ष्य में गुरुद्वारा में कीर्तन दरबार, अखंड पाठ के साथ-साथ अटूट लंगर का आयोजन भी किया जाता है। सिख समुदाय में गुरु हरगोविंद साहिबजी का प्रकाश पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। 
 
सिखों के छठवे गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह जी का जन्म बडाली (अमृतसर, भारत) में हुआ था। वे सिखों के पांचवें गुरु अर्जुनसिंह के पुत्र थे। उनकी माता का नाम गंगा था। उन्होंने अपना ज्यादातर समय युद्ध प्रशिक्षण एवं युद्ध कला में लगाया तथा बाद में वे कुशल तलवारबाज, कुश्ती व घुड़सवारी में माहिर हो गए। उन्होंने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया व सिख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया। वे स्वयं एक क्रांतिकारी योद्धा थे। गुरु हरगोविंद एक परोपकारी योद्धा थे। उनका जीवन-दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुड़ा हुआ था। 
 
गुरु हरगोविंद सिंह ने अकाल तख्त का निर्माण किया था। मीरी पीरी तथा कीरतपुर साहिब की स्थापनाएं की थीं। उन्होंने रोहिला की लड़ाई, कीरतपुर की लड़ाई, हरगोविंदपुर, करतारपुर, गुरुसर तथा अमृतसर- इन लड़ाइयों में प्रमुखता से भागीदारी निभाई थी। वे युद्ध में शामिल होने वाले पहले गुरु थे। उन्होंने सिखों को युद्ध कलाएं सिखाने तथा सैन्य परीक्षण के लिए भी प्रेरित किया था। 
 
हरगोविंदजी ने मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित अनुयायियों में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास पैदा किया। मुगलों के विरोध में गुरु हरगोविंद सिंह ने अपनी सेना संगठित की और अपने शहरों की किलेबंदी की। उन्होंने 'अकाल बुंगे' की स्थापना की। 'बुंगे' का अर्थ होता है एक बड़ा भवन जिसके ऊपर गुंबज हो। उन्होंने अमृतसर में अकाल तख्त (ईश्वर का सिंहासन, स्वर्ण मंदिर के सम्मुख) का निर्माण किया। इसी भवन में अकालियों की गुप्त गोष्ठियां होने लगीं। इनमें जो निर्णय होते थे उन्हें 'गुरुमतां' अर्थात् 'गुरु का आदेश' नाम दिया गया।
 
इस कालावधि में उन्होंने अमृतसर के निकट एक किला बनवाया तथा उसका नाम लौहगढ़ रखा। दिनोदिन सिखों की मजबूत होती स्थिति को खतरा मानकर मुगल बादशाह जहांगीर ने उनको  ग्वालियर में कैद कर लिया। गुरु हरगोविंद 12 वर्षों तक कैद में रहे, इस दौरान उनके प्रति सिखों की आस्था और अधिक मजबूत होती गई। 
 
वे लगातार मुगलों से लोहा लेते रहे। रिहा होने पर उन्होंने शाहजहां के खिलाफ बगावत कर दी और संग्राम में शाही फौज को हरा दिया। अंत में उन्होंने कश्मीर के पहाड़ों में शरण ली, जहां सन् 1644 ई. में कीरतपुर (पंजाब) में उनकी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से ठीक पहले गुरु हरगोविंद ने अपने पोते गुरु हरराय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।
 

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

क्या भारत में बना था ईसा मसीह के कफन का कपड़ा? DNA रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

April Monthly Horoscope 2026: अप्रैल 2026 मासिक राशिफल: जानिए कैसे बदलेंगे आपके जीवन के हालात इस महीने

मंगल का मीन राशि में गोचर: जानें 12 राशियों पर क्या होगा असर

मंगल-शनि की युति से बनेगा ज्वालामुखी योग, दुनिया में हो सकती हैं ये 5 बड़ी घटनाएं

यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धर्म की भविष्‍वाणी: क्या यही है 'कयामत' की लड़ाई?

सभी देखें

धर्म संसार

14 अप्रैल 2026 से सोलर नववर्ष होगा प्रारंभ, क्या है यह?

विषु कानी: केरल की सुखद सुबह और सुनहरे सपनों का पर्व

पोहेला बोइशाख उत्सव कहां मनाया जाता है, क्या है इस दिन की खासियत?

Easter Sunday 2026: ईस्टर संडे का महत्व, इतिहास और पौराणिक परंपराएं

Easter Saturday: ईस्टर सैटरडे क्या होता है, ईसाई समुदाय के लिए इसका क्या है महत्व

अगला लेख