Hanuman Chalisa

सिख धर्म के पांचवे गुरु, गुरु अर्जन देव की जयंती

Webdunia
सिख धर्म के पांचवे गुरु श्री गुरु अर्जन देव साहिब है। वे शिरोमणि, सर्वधर्म समभाव के प्रखर पैरोकार होने के साथ-साथ मानवीय आदर्शों को कायम रखने के लिए आत्म बलिदान करने वाले एक महान आत्मा थे। 
 
गुरु अर्जन देव का जन्म सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदासजी व माता भानीजी के घर 15 अप्रैल 1563 को (वैशाख वदी 7, संवत 1620) गोइंदवाल (अमृतसर) में हुआ। गुरु अरजनदेवजी की निर्मल प्रवृत्ति, सहृदयता, कर्तव्यनिष्ठता तथा धार्मिक एवं मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण भावना को देखते हुए गुरु रामदासजी ने 1581 में पांचवें गुरु के रूप में उन्हें गुरु गद्दी पर सुशोभित किया। 
 
इस दौरान उन्होंने गुरुग्रंथ साहिब का संपादन किया, जो मानव जाति को सबसे बड़ी देन है। संपूर्ण मानवता में धार्मिक सौहार्द पैदा करने के लिए अपने पूर्ववर्ती गुरुओं की वाणी को जगह-जगह से एकत्र कर उसे धार्मिक ग्रंथ में बांटकर परिष्कृत किया। गुरुजी ने स्वयं की उच्चारित 30 रागों में 2,218 शबदों को भी श्री गुरुग्रंथ साहिब में दर्ज किया है। 
 
एक समय की बात है। उन दिनों बाला और कृष्णा पंडित सुंदरकथा करके लोगों को खुश किया करते थे और सबके मन को शांति प्रदान करते थे। एक दिन वे गुरु अर्जन देव जी के दरबार में उपस्थित हुए और प्रार्थना करने लगे- महाराज...! हमारे मन में शांति नहीं है। आप ऐसा कोई उपाय बताएं जिससे हमें शांति प्राप्त होगी? 
 
‍तब गुरु अर्जन देवजी ने कहा- अगर आप मन की शांति चाहते हो तो जैसे आप लोगों को कहते हो उसी प्रकार आप भी करो, अपनी कथनी पर अमल किया करो। परमात्मा को संग जानकर उसे याद रखा करो। अगर आप सिर्फ धन इकट्‍ठा करने के लालच से कथा करोगे तो आपके मन को शांति कदापि प्राप्त नहीं होगी। बल्कि उलटा आपके मन का लालच बढ़ता जाएगा और पहले से भी ज्यादा दुखी हो जाओगे। अपने कथा करने के तरीके में बदलाव कर निष्काम भाव से कथा करो, तभी तुम्हारे मन में सच्ची शांति महसूस होगी। 
 
एक अन्य प्रसंग के अनुसार- एक दिन गद्दी पर बैठने के बाद गुरु अर्जनदेवजी के मन में विचार आया कि सभी गुरुओं की बानी का संकलन कर एक ग्रंथ बनाना चाहिए। जल्द ही उन्होंने इस पर अमल शुरू कर दिया। उस समय नानकबानी की मूल प्रति गुरु अर्जन के मामा मोहनजी के पास थी। 
 
उन्होंने वह प्रति लाने भाई गुरदास को मोहनजी के पास भेजा। मोहनजी ने प्रति देने से इंकार कर दिया। इसके बाद भाई बुड्ढा गए, वे भी खाली हाथ लौट आए। तब गुरु अर्जन स्वयं उनके घर पहुँच गए। सेवक ने उन्हें घर में प्रवेश से रोक दिया। गुरुजी भी धुन के पक्के थे। वे द्वार पर ही बैठकर अपने मामा से गा-गाकर विनती करने लगे। 
 
इस पर मोहनजी ने उन्हें बहुत डाँटा-फटकारा और ध्यान करने चले गए। लेकिन गुरु पहले की तरह गाते रहे। अंततः उनके धैर्य, विनम्रता और जिद को देखकर मोहनजी का दिल पसीजा और वे बाहर आकर बोले- बेटा, नानकबानी की मूलप्रति मैं तुम्हें दूँगा, क्योंकि तुम्हीं उसे लेने के सही पात्र हो। इसके बाद गुरु अर्जन ने सभी गुरुओं की बानी और अन्य धर्मों के संतों के भजनों को संकलित कर एक ग्रंथ बनाया, जिसका नाम रखा 'ग्रंथसाहिब' और उसे हरमंदिर में स्थापित करवाया।
 
अपने ऐसे पवित्र वचनों से दुनिया को उपदेश देने वाले गुरुजी का मात्र 43 वर्ष का जीवनकाल अत्यंत प्रेरणादायी रहा। सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी वे डंटकर खड़े रहे। गुरु अर्जन देव जी ने 'तेरा कीआ मीठा लागे/ हरि नाम पदारथ नानक मागे' शबद का उच्चारण करते हुए सन्‌ 1606 में अमर शहीदी प्राप्त की।

वे आध्यात्मिक चिंतक एवं उपदेशक के साथ ही समाज सुधारक भी थे। अपने जीवन काल में गुरुजी ने धर्म के नाम पर आडंबरों और अंधविश्वास पर कड़ा प्रहार किया। आध्यात्मिक जगत में गुरु जी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

मीन राशि में 5 ग्रहों की बड़ी हलचल: इन 5 राशियों की चमकेगी किस्मत, क्या आपकी राशि है शामिल?

सूर्य अपनी उच्च राशि मेष में, 3 राशियों के लिए गोल्डन टाइम

शनिदेव की कृपा के ये गुप्त संकेत पहचानें, जीवन में आएंगे बड़े बदलाव

क्या आपकी कुंडली में है गंडमूल दोष? तुरंत करें ये 5 असरदार उपाय

मेष राशि में सूर्य का प्लूटो से स्क्वायर, क्या होगा 4 राशियों पर इसका प्रभाव

सभी देखें

धर्म संसार

बुद्ध जयंती 2026: आखिर कहां और कैसे हुआ था गौतम बुद्ध का जन्म? जानें पूरी सच्चाई

Narasimha jayanti 2026: नृसिंह भगवान के बारे में 5 अनसुने रहस्य

गंगोत्री और यमुनोत्री यात्रा की 10 खास बातें, हर यात्री को जरूर जाननी चाहिए

Guru Amar Das Jayanti: गुरु अमरदास जयंती कैसे मनाएं, जानें जीवन परिचय, महत्व और योगदान

Amarnath yatra 2026: कैसे और कब प्रारंभ हुई अमरनाथ यात्रा?

अगला लेख