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रावण की शिव भक्ति के 3 रोचक किस्से

अनिरुद्ध जोशी
मंगलवार, 29 जून 2021 (12:38 IST)
लंकाधिपति रावण शिवजी का परम भक्त था। रावण की शिवभक्ति के किस्से कई मिलते हैं। आओ जानते हैं उसकी शिवभक्ति के 3 रोचक किस्से।
 
 
1. कैलाश पर्वत : कहा जाता है कि एक बार रावण जब अपने पुष्पक विमान से यात्रा कर रहा था तो रास्ते में एक वन क्षेत्र से गुजर रहा था। उस क्षेत्र के पहाड़ पर शिवजी ध्यानमग्न बैठे थे। शिव के गण नंदी ने रावण को रोकते हुए कहा कि इधर से गुजरना सभी के लिए निषिद्ध कर दिया गया है, क्योंकि भगवान तप में मग्न हैं। रावण को यह सुनकर क्रोध उत्पन्न हुआ। उसने अपना विमान नीचे उतारकर नंदी के समक्ष खड़े होकर नंदी का अपमान किया और फिर जिस पर्वत पर शिव विराजमान थे, उसे उठाने लगा। यह देख शिव ने अपने अंगूठे से पर्वत को दबा दिया जिस कारण रावण का हाथ भी दब गया और फिर वह शिव से प्रार्थना करने लगा कि मुझे मुक्त कर दें। इस घटना के बाद वह शिव का भक्त बन गया।
 
यह भी कहा जाता है कि एक बार नारदजी के उकसावे पर रावण अपने प्रभु महादेव को कैलाश पर्वत सहित उठाकर लंका में लाने की सोचने लगा। वह अपने विमान से कैलाश पर्वत गया और वहां जाकर वह पर्वत को उठाने लगा। पर्वत हिलने लगा तो माता पार्वती ने पूछा कि यह पर्वत क्यों हिल रहा है प्रभु। तब शिवजी ने कहा कि मेरा भक्त रावण मुझे पर्वत सहित लंका ले जाना चाहता है। तब भगवान शंकर ने अपना भार बड़ा करके अपने अंगूठे से तनिक-सा जो दबाया तो कैलाश पर्वत फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। इससे रावण का हाथ दब गया और वह क्षमा करते हुए कहने लगा- 'शंकर-शंकर'- अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया। यह क्षमा याचना और स्तुति ही कालांतर में 'शिव तांडव स्तोत्र' कहलाया।
 
2. शिवलिंग : एक बार रावण ने शिवजी की घोर तपस्या की और अपने एक एक सिर काटकर हवन में चढ़ाने लगा। जब दसवां सिर काटने लगा तब शिवजी ने उसका हाथ पकड़ लिया और उससे सभी सिर फिर से स्थापित करके कहा वर मांगो। रावण ने कहा मैं आपके शिवलिंग स्वरूप को लंका में स्थापित करना चाहता हूं। तब शिवजी ने अपने शिवलिंग स्वरूप दो चिन्ह दिए और कहा कि इन्हें भूमि पर मत रखना अन्यथा ये वहीं स्थापित हो जाएंगे। रावण उन दोनों शिवलिंग को लेकर चला और रास्ते में गौकर्ण क्षेत्र में एक जगह उसे लघुशंका लगी तो उसने बैजु नाम के एक गड़रिये को दोनों शिवलिंग पकड़ने को कहा और हिदायत दी कि इसे किसी भी हालत में नीचे मत रखना।
 
कहते हैं कि भगवान शिव ने अपनी माया से उन दोनों का वजन बढ़ा दिया और गड़रिये को शिवलिंग नीचे रखना पड़े और वह अपने पशु चराने चला गया। इस तरह दोनों शिवलिंग वहीं स्थापित हो गए। जिस मंजूषा में रावण के दोनों शिवलिंग रखे थे उस मंजूषा के सामने जो शिवलिंग था वह चन्द्रभाल के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जो पीठ की ओर था वह बैजनाथ के नाम से जाना गया। कहते हैं कि रावण को भगवान शिव की चालाकी समझ में आ गई और वह बहुत क्रोधित हुआ। क्रोधित रावण ने अपने अंगूठे से एक शिवलिंग को दबा दिया जिससे उसमें गाय के कान (गौ-कर्ण) जैसा निशान बन गया। हिमाचल के कांगड़ा से 54 किमी और धर्मशाला से 56 किमी की दूरी पर बिनवा नदी के किनारे बसा है बैजनाथ धाम।
 
3.  कुरुक्षेत्र : कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध हुआ था। वहां पर त्रेतायुग में लंकाधिपति रावण और उसके पुत्र मेघनाद ने शिवजी की तपस्या करके अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। यहां पर महाकालेश्वर मंदिर है। यहीं पर द्वापर के जयद्रथ ने भी तपस्या की थी। आकाश मार्ग से गुजरते वक्त रावण का विमान डगमगाने लगा था। वहां नीचे शिवलिंग को देखकर वह रुक गया। तब रावण ने यहां शिव की तपस्या की। लंबी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने प्रार्थना की कि इस घटना का कोई साक्षी नहीं होना चाहिए। उस समय भगवान शिव ने नंदी से अपने से दूर किया हुआ था। सभी से यहां शिवलिंग की पूजा बगैर नंदी के की जाती है।

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