Publish Date: Tue, 01 Sep 2026 (12:31 IST)
Updated Date: Tue, 01 Sep 2026 (12:36 IST)
हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रतिवर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक 2 दिन पूर्व (भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि को) हल षष्ठी का पर्व मनाया जाता है। इसे हलछठ, चंद्र षष्ठी, बलदेव छठ, ललई षष्ठी और रंधन षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। द्वापर युग में भगवान विष्णु के अवतार और श्री कृष्ण के बड़े भ्राता भगवान बलराम का जन्म इसी तिथि को हुआ था। बलराम जी को सृजन का देवता और हलधारी माना जाता है, इसलिए इस दिन हल षष्ठी के रूप में उनके जन्मोत्सव की पूजा की जाती है।
हल षष्ठी व्रत का महत्व और नियम
संतान की दीर्घायु: यह व्रत विशेष रूप से पुत्रवती माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान के जीवन के समस्त कष्ट नष्ट हो जाते हैं और उन्हें भगवान बलराम (शेषनाग) की तरह बल और रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजन एवं नियम: इस दिन हल की पूजा का विशेष महत्व है। महुए की दातुन का उपयोग किया जाता है।
खान-पान के वर्जित नियम:
इस दिन गाय के दूध, दही और घी का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है।
हल से जोतकर उगाए गए अन्न और फलों का सेवन भी नहीं किया जाता।
पारणा: दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को बिना हल से जोते उपजे पसही के चावल (तिन्नी का चावल) या महुए का लाटा बनाकर व्रत का पारणा किया जाता है।
हल षष्ठी व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है, एक ग्वालिन का प्रसव काल अत्यंत निकट था। एक ओर वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी, तो दूसरी ओर उसे अपना दूध-दही खराब होने का भय था। इसलिए वह सिर पर दूध-दही के घड़े रखकर बेचने निकल पड़ी।
मार्ग में असहनीय पीड़ा होने पर उसने एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में एक बालक को जन्म दिया। वह नवजात शिशु को वहीं छोड़कर पास के गांव में दूध बेचने चली गई। उस दिन हल षष्ठी का पर्व था। ग्वालिन ने अधिक लाभ कमाने के लालच में गाय और भैंस के मिश्रित दूध को 'केवल भैंस का दूध' बताकर गांव की स्त्रियों को बेच दिया और उनका धर्म भ्रष्ट कर दिया।
उधर, जिस स्थान पर बालक लेटा था, उसके पास एक किसान हल चला रहा था। अचानक किसान के बैल भड़क उठे और हल की फाल (फल) बच्चे के पेट में लग जाने से उसकी मृत्यु हो गई। किसान ने अत्यंत दुखी होकर धैर्य से काम लिया; उसने झरबेरी के कांटों से ही बालक के कटे पेट पर टांके लगाए और वहां से चला गया।
जब ग्वालिन लौटी और उसने बालक की यह दशा देखी, तो उसे तुरंत आभास हो गया कि यह उसके द्वारा बोले गए झूठ और अधर्म की ही सजा है। उसने पश्चाताप करने का निश्चय किया। वह तुरंत गांव वापस गई और घर-घर जाकर अपनी करतूत स्वीकार करते हुए अपनी भूल की क्षमा मांगने लगी। गांव की स्त्रियों ने उसके पश्चाताप को देखकर और स्वधर्म की रक्षा हेतु उसे क्षमा कर दिया।
जब ग्वालिन माताओं का आशीर्वाद लेकर पुनः झरबेरी के नीचे पहुंची, तो वह देखकर चकित रह गई कि उसका पुत्र जीवित और स्वस्थ खेल रहा था। उस दिन ग्वालिन ने समझा कि स्वार्थ के लिए झूठ बोलना ब्रह्महत्या के समान पाप है, और उसने जीवन में कभी झूठ न बोलने का प्रण लिया।
हल षष्ठी के दिन भक्तिपूर्वक व्रत रखने और इस कथा को सुनने से संतान को लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन का फल प्राप्त होता है।