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हिंगलाज माता का रहस्यमयी शक्तिपीठ: सरहदों से परे नानी पीर की महिमा

WD Feature Desk
मंगलवार, 17 मार्च 2026 (11:31 IST)
बलूचिस्तान की सुरम्य पहाड़ियों और हिंगोल नदी के तट पर स्थित हिंगलाज माता मंदिर आस्था का एक ऐसा केंद्र है, जहाँ मजहब की दीवारें धुंधली पड़ जाती हैं। माता सती के 51 शक्तिपीठों में से एक इस स्थान को हिंदू जहाँ परम शक्ति मानते हैं, वहीं मुस्लिम समुदाय इन्हें अत्यंत श्रद्धा के साथ 'नानी पीर' कहकर पुकारता है।
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आस्था और इतिहास का संगम

माना जाता है कि यह गुफा मंदिर 2000 वर्षों से भी अधिक पुराना है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहाँ माता सती का मस्तिष्क गिरा था। इस स्थान की महत्ता इतनी है कि यहाँ की यात्रा करने वाली महिलाओं को 'हाजियानी' कहकर सम्मानित किया जाता है। इतिहास गवाह है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम, गुरु नानक देव और गुरु गोरखनाथ जैसी महान विभूतियों ने भी यहाँ शीश नवाया है।
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चमत्कार और परंपराएं

अंगारों पर चलना (चुल): मान्यता है कि माता के आशीर्वाद से भक्त धधकते अंगारों पर चलते थे और उन्हें खरोंच तक नहीं आती थी।
प्राकृतिक स्वरूप: यहाँ कोई भव्य कृत्रिम ढांचा नहीं, बल्कि एक विशाल प्राकृतिक गुफा है। मंदिर के पास ही 'चंद्रकूप' मिट्टी का ज्वालामुखी और पवित्र जल के कुंड स्थित हैं।
साझा विरासत: विभाजन से पूर्व यह क्षेत्र भारत का हिस्सा था। आज भी कराची के सिंधी हिंदुओं के साथ-साथ स्थानीय मुस्लिम भी लाल कपड़े और इत्र चढ़ाकर माता का आशीर्वाद लेते हैं।
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कठिन डगर, पावन लक्ष्य

कराची से शुरू होने वाली यह यात्रा रेगिस्तानों और पहाड़ों से होकर गुजरती है। मरुतीर्थ की इस यात्रा में भक्त हिंगोल नदी में स्नान कर अपनी शुद्धि करते हैं और कठिन रास्तों को पार कर उस गुफा तक पहुँचते हैं, जहाँ माता साक्षात वैष्णो देवी के रूप में विराजमान हैं। यह मंदिर न केवल शक्ति की उपासना का स्थल है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द का एक जीवित प्रमाण भी है।

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