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आल्हा जयंती कैसे और कब मनाई जाती है?

वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम
सोमवार, 25 मई 2026 (10:40 IST)
Alha Jayanti celebration: बुंदेलखंड के महान और अदम्य साहसी योद्धा वीर आल्हा की जयंती हर साल 25 मई को मनाई जाती है। आल्हा और उनके छोटे भाई ऊदल (उदयसिंह), महोबा के राजा परमाल (जिन्हें इतिहास में परमर्दी देव चंदेल के नाम से जाना जाता है) के महान सेनापति थे, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए 52 युद्ध लड़े थे और वे किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए।ALSO READ: Navtapa 2026 dates: कब से कब तक रहेगा नौतपा?
 

आइए जानते हैं कि आल्हा जयंती कैसे और क्यों मनाई जाती है:

 

आल्हा जयंती कैसे मनाई जाती है?

आल्हा जयंती मुख्य रूप से बुंदेलखंड क्षेत्र (उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्से) में बेहद उत्साह और गर्व के साथ मनाई जाती है। इसे मनाने के पारंपरिक तरीके निम्नलिखित हैं:
 

1. 'आल्हा खंड' (आल्हा गायन) का आयोजन

इस दिन बुंदेलखंड के गांवों, चौपालों और शहरों में विशेष रूप से "आल्हा गायन" के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
 
महोबा के राजकवि जगनिक, जिन्हें 'परमाल रासो' के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा रचित 'आल्हा खंड' (वीर रस से भरपूर महाकाव्य) को ढोलक और मंजीरों की थाप पर ऊंचे स्वर में गाया जाता है। बुंदेली भाषा में गाए जाने वाले ये गीत बहुत लोकप्रिय हैं। इसे सुनने के लिए भारी भीड़ उमड़ती है, क्योंकि इसके शब्दों और धुनों में आज भी युवाओं के रोंगटे खड़े कर देने वाला वीर रस होता है।
 

2. मैहर माता मंदिर (सतना, मरणोपरांत मान्यता) में विशेष पूजा

आल्हा को मां शारदा (सरस्वती) का परम भक्त माना जाता है। मान्यता है कि मां शारदा के आशीर्वाद से ही उन्हें अमरत्व का वरदान मिला था। इस दिन मध्य प्रदेश के महोबा और मैहर (शारदा भवानी मंदिर) में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लोक मान्यता है कि आज भी हर सुबह मंदिर के कपाट खुलने से पहले वीर आल्हा अदृश्य रूप से आकर मां शारदा की सबसे पहली पूजा और श्रृंगार करके जाते हैं।
 

3. शौर्य यात्राएं और प्रतिमा पूजन

बुंदेलखंड के कई शहरों में वीर आल्हा और ऊदल की मूर्तियों पर माल्यार्पण किया जाता है। राजपूत और स्थानीय समाज के लोग इस दिन भव्य शौर्य यात्राएं निकालते हैं और उनके पराक्रम को याद करते हैं।
 

आल्हा जयंती का महत्व

अमरता की लोक मान्यता: ऐसी लोक कथाएं हैं कि आल्हा ने अपने जीवन के अंतिम समय में युद्ध छोड़कर संन्यास ले लिया था और वे आज भी अमर हैं।
 
अंतिम युद्ध: आल्हा-ऊदल ने अपना आखिरी और सबसे प्रसिद्ध युद्ध दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान के साथ लड़ा था, जिसमें उनके भाई ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए थे, लेकिन आल्हा ने अद्भुत वीरता दिखाई थी।
 
सांस्कृतिक धरोहर: यह जयंती बुंदेलखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का माध्यम है। इसके जरिए आने वाली पीढ़ी को देश और माटी के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले वीरों की कहानियों से परिचित कराया जाता है।
 
आल्हा जयंती हर वर्ष उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। यह त्योहार भाईचारे, वीरता और ऐतिहासिक गौरव का प्रतीक है। यह पर्व प्रसिद्ध लोक नायक आल्हा और ऊदल की वीरता, पराक्रम और युद्ध कौशल को समर्पित है। आल्हा जयंती केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह वीरता, परिवार, और देशभक्ति की भावना को भी जागृत करता है।
 
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Nautapa 2026: रोहिणी नक्षत्र में सूर्य गोचर 2026: नौतपा के 9 दिनों में क्या करें और क्या न करें?
 

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