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11 सितंबर 1893: जब भारत के शाश्वत दर्शन ने विश्व को गुंजायमान किया

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swami vivekananda
इतिहास में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जो सदियों की मौन साधना को वाणी प्रदान कर देते हैं। 11 सितंबर 1893 का दिन ऐसा ही एक स्वर्णिम अध्याय था, जब शिकागो के विश्व धर्म संसद मंच से एक युवा संन्यासी के रूप में भारत की आत्मा ने विश्व से संवाद किया। बिना किसी राजनीतिक सत्ता या संसाधनों के, केवल भारत के हजारों वर्षों के चिंतन और वेदांत की अमर शक्ति के साथ स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के समक्ष भारत का आत्मविश्वास से भरा स्वरूप प्रस्तुत किया।
 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संकल्प की शक्ति

1893 का भारत पराधीनता, सामाजिक विषमताओं और आत्महीनता के दौर से जूझ रहा था। ऐसे विषम समय में स्वामी विवेकानंद ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का संकल्प लिया।
साधनों का अभाव: आर्थिक तंगी, परिचय की कमी और अनेक बाधाओं के बावजूद वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं।
सभ्यता का प्रतिनिधित्व: वे किसी संस्था या शक्ति के दूत बनकर नहीं, बल्कि उपनिषदों, बुद्ध और संतों की समन्वयकारी ज्ञान-परंपरा के जीवंत स्वर बनकर खड़े हुए।

'भाइयों और बहनों'—आत्मीयता का उद्घोष

  • जैसे ही स्वामी जी के मुख से "अमेरिका के मेरे भाइयों और बहनों" के शब्द निकले, पूरा सभागार करतल ध्वनि से गूंज उठा।
  • यह केवल एक शिष्टाचार या औपचारिक संबोधन नहीं था, बल्कि वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय अवधारणा की सजीव अभिव्यक्ति थी।
  • उन्होंने मनुष्य को किसी पंथ, जाति या सीमा में बांधने के बजाय सबसे पहले आत्मीयता के धरातल पर स्वीकार किया।

भारतीय दर्शन की विशालता और समरसता

स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म और भारतीय चिंतन को किसी संकीर्ण दायरे में सीमित करके नहीं, बल्कि सत्य की अनवरत खोज के रूप में रेखांकित किया।
विविधता का सम्मान: भारतीय मनीषा विविधता को विभाजन नहीं, बल्कि अस्तित्व की स्वाभाविक और सुंदर अभिव्यक्ति मानती है।
व्यापक दृष्टि: उपनिषदों की सत्य-शोधन परंपरा, योग का अनुशासन और वेदांत का एकत्व—इन सभी को उन्होंने पश्चिमी जगत की व्यावहारिक भाषा में प्रस्तुत किया।
सक्रिय अध्यात्म: उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय अध्यात्म जीवन से भागने का नाम नहीं, बल्कि आंतरिक आत्मबल और आत्मबोध का मार्ग है।
 

वैश्विक मनीषियों की दृष्टि में प्रभाव

रोमा रोलां: फ्रांसीसी साहित्यकार रोमा रोलां ने स्वामी जी की तेजस्विता, ओजस्वी वाणी और गरिमामय व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए लिखा कि उनके आते ही मंच के अन्य प्रतिनिधियों का प्रभाव फीका पड़ गया था।
रामधारी सिंह 'दिनकर': राष्ट्रकवि दिनकर के अनुसार, प्रारंभ में अपरिचित होने के कारण स्वामी जी को सबसे अंत में बोलने का समय दिया जाता था, लेकिन उनके विचारों की प्रखरता के कारण श्रोता पूरे कार्यक्रम के अंत तक केवल उन्हें सुनने के लिए प्रतीक्षा करते थे।
 

वैचारिक दिग्विजय और वर्तमान प्रासंगिकता

स्वामी विवेकानंद की इस सफलता को 'वैचारिक दिग्विजय' कहा गया। यह किसी साम्राज्य पर अधिकार की नहीं, बल्कि विचारों, करुणा और सह-अस्तित्व की विजय थी।
आज के समय में आवश्यकता: आधुनिक विश्व तकनीक में भले ही आगे बढ़ चुका हो, लेकिन मानसिक तनाव, असहिष्णुता और आंतरिक अशांति से ग्रस्त है। ऐसे में एकत्व और आत्मसंयम का भारतीय दर्शन आज और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
आत्मनिरीक्षण का अवसर: यह दिन केवल इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि यह सोचने का है कि क्या हम उस उदार और आत्मविश्वासी भारत के दर्शन को अपने आचरण, शिक्षा और समाज में उतार पा रहे हैं?
 
11 सितंबर 1893 को स्वामी जी के माध्यम से भारत ने दुनिया को जीतने का नहीं, बल्कि दुनिया को जोड़ने का शाश्वत संदेश दिया था—और यही भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है।

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