Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia

आज के शुभ मुहूर्त

(चतुर्दशी तिथि)
  • तिथि- अधि. ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी
  • अभिजीत मुहूर्त- सुबह 11:53 एएम से दोपहर 12:49 पीएम
  • त्योहार/व्रत/मुहूर्त- पूर्णिमा व्रत
  • राहुकाल (अशुभ)- सुबह 08:52 एएम से 10:37 एएम
webdunia

भारतीय अध्यात्म के प्रतीक थे स्वामी विवेकानंद

Advertiesment
vivekananda and religion
आधुनिक सदी में भारतीय अध्यात्म के प्रतीक एवं रामकृष्ण परमहंस के शिष्य रहे नरेंद्रनाथ दत्त का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ। वे कालांतर में स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रख्यात हुए। 
 
नरेन्द्रनाथ ने 1879 में एंट्रेंस परीक्षा पास की और वे प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता से 1884 में बी.ए. हुए। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की थी, परंतु वे कानून की अंतिम वर्ष की परीक्षा में नहीं बैठ सके। पढ़ाई के दौरान ही नरेन्द्रनाथ की संपूर्ण आत्मिक ऊर्जा परब्रह्म की खोज की ओर मुखर हुई। वे ध्यान एवं समाधि में लीन रहने लगे। सत्य की खोज के दौरान ही वे महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर, केशवचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री व समाज के अन्य मनीषियों के संपर्क में आए। समाज सुधार का उनके मन में विशिष्ट स्थान था। 
 
वे सती प्रथा के विरुद्ध और नारी शिक्षा के पक्षधर थे। 1822 में नरेंद्रनाथ रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए और उनके सभी तार्किक-वैज्ञानिक आधारों की संतुष्टि के पश्चात वे विवेकानंद बने। 
 
दुनिया के इतिहास में यह बिरला ही उदाहरण है कि गुरु परमहंस ने उनके शिष्य को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर किया। उन्होंने तीन बार हरिद्वार की यात्राएं की और दिसंबर, 1892 में कन्याकुमारी पहुंचे, जहां एक शिला पर उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ। यह शिला 'विवेकानंद शिला' के नाम से जानी जाती है। 
मुंबई से वे 31 मई, 1893 में अमेरिका गए और हार्वर्ड के प्रोफेसर राइट के प्रयासों से वे शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन को संबोधित करने में सफल हुए। 
 
11 सितंबर, 1893 को स्वामी जी ने इस सभा को संबोधित किया और भारतीय अध्यात्म एवं राष्ट्रवाद के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता के रूप में स्वीकारे गए। 
स्वामी के मतानुसार पूरब और पश्चिम की सभ्यताएं एक-दूसरे की पूरक हैं। लंदन यात्रा के दौरान स्वामीजी ने मार्गरेट नोबेल का भगिनि निवेदिता के रूप में नामकरण संस्कार किया।
 
उनके ये अमूल्य विचार आज भी जीवन के लिए बहुउपयोगी है :- 
 
* 'उठो, जागो और तब तक न रुको, जब तक कि तुम लक्ष्य पर न पहुंच जाओ।'
 
ॐ 'कामनासागर की भांति अतृप्त है, ज्यों-ज्यों हम उसकी आवश्यकता पूरी करते हैं, त्यों-त्यों उसका कोलाहल बढ़ता है। जीवन का रहस्य भोग में नहीं है, पर अनुभव के द्वारा शिक्षा प्राप्ति में है।'
 
स्वामी विवेकानंद ने हमेशा वेदों के विश्वव्यापी मानवीय स्वरूप पर बल दिया और सभी धर्मों में व्याप्त एकत्व स्वरूप को मुखर किया।


Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

इस बार क्यों है 15 को संक्रांति? जानिए शास्त्र सम्मत कारण