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कैसे होगा राम लला के मस्तक का दिव्य सूर्य तिलक, जानिए क्या है आध्यात्मिक महत्व

WD Feature Desk
शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025 (13:26 IST)
Ram navmi 2025 soorya tilak: इस साल रामजन्मोत्सव का पर्व छह अप्रैल को मनाया जाएगा। इस दिन ठीक दोपहर 12:00 बजे रामलला का सूर्य तिलक होगा। वैज्ञानिकों ने इसे ''सूर्य तिलक मैकेनिज्म'' नाम दिया है जिसकी सहायता से हर रामनवमी यानी भगवान राम के जन्मदिन पर रामलला के माथे पर यह विशेष सूर्य तिलक सजेगा। दोपहर 12 बजे से होने वाले इस भव्य सूर्य तिलक को सभी रामभक्त टेलीविजन के माध्यम से   देख सकेंगे।  

सूर्य तिलक क्या है?
सूर्य तिलक एक विशेष प्रणाली है, जिसके माध्यम से रामनवमी के दिन सूर्य की किरणों को रामलला के मस्तक पर इस प्रकार डाला जाता है कि उनका अभिषेक हो सके। यह एक अद्भुत दृश्य होता है, जिसमें सूर्य की किरणें रामलला के मस्तक को प्रकाशित करती हैं।

किसने तैयार किया है सूर्य तिलक?

सूर्य तिलक प्रणाली को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI) रुड़की ने तैयार किया है। इस प्रणाली में ऑप्टो-मैकेनिकल सिस्टम का उपयोग किया गया है, जिसमें दर्पण और लेंस लगे हुए हैं। यह प्रणाली सूर्य की किरणों को रामलला के मस्तक तक पहुँचाने के लिए डिज़ाइन की गई है। राम जन्मोत्सव पर इस आयोजन के लिए रुड़की के वैज्ञानिकों की टीम अयोध्या पहुंच गई है और सूर्य तिलक के लिए उपकरण लगाने का काम शुरू कर दिया है। वैज्ञानिकों की ओर से दी गई जानकारी अनुसार अगले 19 सालों तक सूर्य तिलक का समय हर साल बढ़ता जाएगा।

सूर्य तिलक का मैकेनिकल सिस्टम कैसा है?
सूर्य तिलक प्रणाली में एक ऑप्टो-मैकेनिकल सिस्टम है, जिसमें चार दर्पण और चार लेंस लगे हुए हैं। यह सिस्टम मंदिर के भूतल से लेकर शिखर तक स्थापित किया गया है। सूर्य की किरणें सबसे पहले शिखर पर लगे दर्पण पर पड़ती हैं, और फिर लेंस और अन्य दर्पणों से गुजरते हुए रामलला के मस्तक तक पहुँचती हैं।
सबसे पहले मंदिर के तीसरे तल पर लगे दर्पण पर सूर्य की किरणें पड़ेंगी। दर्पण से 90 डिग्री पर परावर्तित होकर ये किरणें एक पीतल के पाइप से होते हुए दूसरे छोर पर एक और दर्पण से सूर्य किरणें एक बार फिर से परावर्तित होंगी और पीतल की पाइप के साथ 90 डिग्री पर मुड़ जाएंगी। किरणें दूसरी बार परावर्तित होने के बाद लंबवत दिशा में मंदिर के नीचे की ओर चलेंगी। इस दौरान एक के बाद एक तीन लेंसों से गुजरते हुए जब किरने मंदिर के गर्भगृह की ओर आगे बढेंगी तो इनकी तीव्रता और बढ़ जाएगी। इसके बाद लंबवत पाइप के दूसरे छोर पर लगे दर्पण पर किरणें पड़ेंगी और दोबारा 90 डिग्री पर मुड़ जाएंगी। यहां से किरणें सीधे रामलला के मस्तक पर पड़ेंगी और करीब तीन से चार मिनट तक राम लला का सूर्य तिलक होगा। इस तरह से रामलला का सूर्य तिलक संपन्न होगा। खास बात यह है कि इस गियर-बेस्ड सूर्य तिलक मैकेनिज्म में बैटरी, बिजली या लोहे का उपयोग नहीं किया जाएगा।

अगले 19 वर्षों तक बढ़ता रहेगा सूर्य तिलक का समय
इस रामनवमी से लेकर अगले 20 सालों तक रामजन्मोत्सव पर सूर्य की किरणें रामलला का अभिषेक करेंगी। भारतीय खगोलीय भौतिकी संस्थान बंगलूरू के अनुसार  आने वाले 19 सालों तक हर साल सूर्य तिलक का समय बढ़ता जाएगा। 19 साल बाद यानी 2025 रामनवमी को सूर्य तिलक का समय फिर से 2025 की रामनवमी जितनी देर का होगा। इस आशय यह है की19 साल बाद 2044 में भी उतनी ही देर के लिए सूर्य तिलक होगा। जानकारी के अनुसार हर साल रामनवमी के दिन दोपहर 12 बजे 75 मिमी के गोलाकार रूप में सूर्य की किरणें भगवान राम की मूर्ति के माथे पर पड़ेंगी।

सूर्य तिलक का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

सूर्य तिलक मैकेनिज्म का उपयोग प्राचीन समय से ही कुछ जैन मंदिरों में किया जा रहा है। इसके अलावा और कोणार्क के सूर्य मंदिर में भी सूर्य तिलक पद्धति विक्सित की गई थी। हालांकि उनमें अलग तरह की प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है।  यदि सूर्य तिलक के आध्यात्मिक महत्व की बात करें तो हिंदू धर्म में सूर्य को जीवन का स्रोत माना जाता है। सूर्य तिलक भगवान राम के सूर्यवंशी होने का प्रतीक है।

 

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