Publish Date: Thu, 17 Sep 2026 (10:25 IST)
Updated Date: Thu, 17 Sep 2026 (11:33 IST)
Ganesh Chaturthi 2026 : पौराणिक मान्यताओं और शास्त्रों (विशेषकर ब्रह्मवैवर्त पुराण) के अनुसार, भगवान श्री गणेश की पूजा और भोग में तुलसी का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है, जबकि गणेशजी की पूजा में तुलसी की जगह दुर्वा (दूर्वा घास), मोदक, मोतीचूर के लड्डू और शमी के पत्ते अर्पित करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इसके पीछे एक मुख्य पौराणिक कथा जुड़ी है, जिसमें गणेश जी और देवी तुलसी द्वारा एक-दूसरे को दिए गए श्राप का वर्णन मिलता है। आइए जानते हैं भगवान गणपति जी को भोग में क्यों नहीं अर्पित करते हैं तुलसी?
गणेश जी की तपस्या में विघ्न
पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान गणेश जी को तुलसी अर्पित करना वर्जित (मना) माना गया है, क्योंकि एक बार देवी तुलसी ने विवाह के प्रस्ताव को ठुकराए जाने पर गणेश जी को और गणेश जी ने उन्हें प्रतिश्राप दिया था। एक बार भगवान गणेश गंगा नदी के तट पर तल्लीन होकर तपस्या कर रहे थे। उसी समय देवी तुलसी वहां से गुजरीं और गणेश जी के तेजस्वी रूप को देखकर मोहित हो गईं। देवी तुलसी ने विवाह की इच्छा से गणेश जी का ध्यान भंग किया और उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
गणेशजी ने विनम्रतापूर्वक ठुकराया प्रस्ताव
गणेश जी ने स्वयं को आजीवन ब्रह्मचारी बताकर विवाह का प्रस्ताव विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। इससे क्रोधित होकर तुलसी जी ने गणेश जी को श्राप दिया कि उनकी दो शादियां होंगी। इसी श्राप के कारण कालान्तर में गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ। इसके उत्तर में गणेश जी ने भी क्रोध में आकर तुलसी जी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर (शंखचूड़) से होगा।
क्षमा और वरदान
अपनी भूल का अहसास होने पर तुलसी जी ने क्षमा मांगी। गणेश जी ने उन्हें वरदान दिया कि वे भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की प्रिय होंगी तथा कलयुग में मोक्षदायिनी बनेंगी, परंतु गणेश जी ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पूजा या भोग में तुलसी दल का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इसी मान्यता के कारण गणपति जी को मोदक और दूर्वा (घास) का भोग व अर्पण किया जाता है, किंतु तुलसी वर्जित मानी गई है।