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पोहेला बोइशाख उत्सव कहां मनाया जाता है, क्या है इस दिन की खासियत?

वेबदुनिया फीचर टीम
मंगलवार, 14 अप्रैल 2026 (11:46 IST)
Bengali New Year 1433: पश्चिम बंगाल की सोंधी मिट्टी और ढाक की थाप के बीच जब 'पोहेला बोइशाख' का आगमन होता है, तो वह केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उत्सवों की एक नई सुबह लेकर आता है। इसे हम 'नबा बरशा' या 'नोबोबर्षो' के नाम से भी जानते हैं, जो बंगाली कैलेंडर के पहले दिन यानी मेष संक्रांति के साथ शुरू होता है। बंगाली युग 1433 पोहेला बोइशाख 15 अप्रैल 2026 बुधवार से प्रारंभ होगा।
 
यह नव वर्ष सिर्फ पश्चिम बंगाल तक ही सीमित नहीं है; इसकी रौनक असम, त्रिपुरा और बांग्लादेश के बंगाली समुदायों में भी बराबर देखने को मिलती है। दिलचस्प बात यह है कि असम की धरती पर इसे 'बिहू' के नाम से पुकारा जाता है, जो वहां के जनजीवन में नए साल की उमंग भर देता है। 
 

इतिहास और गणना की अनूठी झलक

  • अगर हम वक्त के पन्नों को पलटें, तो बंगाली युग की शुरुआत का श्रेय प्राचीन बंगाल के प्रतापी राजा शोशंगको को जाता है।
  • इतिहासकारों का मानना है कि इस कैलेंडर का सफर ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) के मुकाबले साल 594 के आसपास शुरू हुआ था।

समय की इस गणना का गणित भी काफी रोचक है:

पोहेला बोइशाख से पहले: अगर आप बंगाली वर्ष की गणना करेंगे, तो यह ग्रेगोरियन कैलेंडर से 594 वर्ष पीछे नजर आएगा।
पोहेला बोइशाख के बाद: यही अंतर सिमटकर 593 वर्ष रह जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो, यह कैलेंडर अपनी प्राचीन परंपराओं को समेटे हुए आज भी आधुनिक दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।
 

राजा शोशंगको का मत (प्राचीन जड़ें)

कई इतिहासकारों का मानना है कि बंगाली कैलेंडर की नींव 7वीं शताब्दी में बंगाल के पहले स्वतंत्र प्रतापी राजा शोशंगको (Shashanka) ने रखी थी।
समय: इसकी शुरुआत 594 ईस्वी (CE) के आसपास मानी जाती है।
तर्क: प्राचीन शिव मंदिरों के शिलालेखों में 'बंगाब्द' शब्द का उल्लेख मिलता है, जो यह दर्शाता है कि यह कैलेंडर मुग़ल काल से बहुत पहले अस्तित्व में था। राजा शोशंगको के राज्याभिषेक के समय को ही इस संवत का आधार माना जाता है।

बंगाली महीनों के नाम कहाँ से आए?

बंगाली कैलेंडर के महीनों के नाम प्राचीन 'विक्रम संवत' से प्रेरित हैं, जो नक्षत्रों (सितारों) के नामों पर आधारित हैं:
बैशाख: विशाखा नक्षत्र से
ज्येष्ठ: ज्येष्ठा नक्षत्र से
आषाढ़: पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र से
इसी तरह अन्य महीनों के नाम भी खगोलीय पिंडों पर आधारित हैं।

वर्तमान की स्थिति

आज बंगाली कैलेंडर के दो मुख्य रूप प्रचलित हैं:-
भारत (पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम): यहां आज भी 'सूर्य सिद्धांत' पर आधारित पारंपरिक सौर कैलेंडर का पालन होता है।
बांग्लादेश: यहाँ 1966 में डॉ. मुहम्मद शाहिदुललाह की अध्यक्षता वाली समिति ने इसमें कुछ सुधार किए ताकि लीप वर्ष और महीनों के दिन निश्चित रहें। इसीलिए बांग्लादेश में 'पोहेला बोइशाख' हमेशा 14 अप्रैल को होता है, जबकि पश्चिम बंगाल में यह मीन संक्रांति से प्रारंभ होता है।

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