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20 सितंबर को डोल ग्यारस, श्रीकृष्ण के जलवा पूजन का दिन, जानिए क्यों और कब मनती हैं डोल ग्यारस

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जानिए डोल ग्यारस पर कृष्ण के जलवा पूजन का महत्व 
 
डोल ग्यारस हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसीलिए यह 'परिवर्तनी एकादशी' भी कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह एकादशी 'पद्मा एकादशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है। इस दिन को व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। 
 
श्रीकृष्ण जन्म के ग्यारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है। जलवा पूजन के बाद ही संस्कारों की शुरुआत होती है। जलवा पूजन को कुआं पूजन भी कहा जाता है। इस ग्यारस को परिवर्तिनी एकादशी, जयझूलनी एकादशी, वामन एकादशी आदि के नाम से भी जाना जाता है।
 
'डोल ग्यारस' के अवसर पर कृष्ण मंदिरों में पूजा-अर्चना होती है। भगवान कृष्ण की मूर्ति को 'डोल' में विराजमान कर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस अवसर पर कई शहरों में मेले, चल समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। इसके साथ ही डोल ग्यारस पर भगवान राधा-कृष्ण के एक से बढ़कर एक नयनाभिराम विद्युत सज्जित डोल निकाले जाते हैं। इसमें साथ चल रहे अखाड़ों के उस्ताद व खलीफा तथा कलाकार अपने हैरतअंगेज प्रदर्शन से भक्तों को रोमांचित करते हैं। 
 
ग्यारस का महत्व : शुक्ल-कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को चंद्रमा की ग्यारह कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। फलत: शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसी कारण उपवास द्वारा शरीर को संभालना और इष्टपूजन द्वारा मन को नियंत्रण में रखना एकादशी व्रत विधान का मुख्य रहस्य है।
 
इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।
 
एकादशी तिथि (ग्यारस) का वैसे भी सनातन धर्म में बहुत महत्‍व माना गया है। ऐसी मान्‍यता है, कि डोल ग्‍यारस का व्रत रखे बगैर जन्‍माष्‍टमी का व्रत पूर्ण नहीं होता। एकादशी तिथि में भी शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रेष्ठ माना गया है। शुक्ल पक्षों में भी पद्मीनी एकादशी का पुराणों में बहुत महत्व बताया गया है।
 
एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान कृष्ण की भक्ति करने का विधान है। इस व्रत में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की कामना पूर्ण होती है तथा रोग और शोक मिट जाते हैं।
 
इस दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप का जलवा पूजन किया गया था। माता यशोदा ने बालगोपाल कृष्ण को नए वस्त्र पहना कर सूरज देवता के दर्शन करवाए तथा उनका नामकरण किया। इस दिन भगवान कृष्ण के आगमन के कारण गोकुल में जश्न हुआ था। उसी प्रकार आज भी कई स्थानों पर इस दिन मेले एवं झांकियों का आयोजन किया जाता हैं। माता यशोदा की गोद भरी जाती हैं। कृष्ण भगवान को डोले में बिठाकर झांकियां सजाईं जाती हैं। कईं कृष्ण मंदिरों में नाट्य-नाटिका का आयोजन भी किया जाता हैं। 
 
डोल ग्यारस के दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की भी पूजा की जाती है, क्योंकि इसी दिन राजा बलि से भगवान विष्णु ने वामन रूप में उनका सर्वस्व दान में मांग लिया था एवं उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर अपनी एक प्रतिमा को राजा बलि को सौंप दी थी, इसी वजह से इसे वामन ग्यारस भी कहा जाता है।
 
मेले का आयोजन:
 
डोल ग्यारस को राजस्थान में 'जलझूलनी एकादशी' कहा जाता है। इस अवसर पर गणपति पूजा, गौरी स्थापना की जाती है। इस शुभ तिथि पर यहां पर कईं जगहों पर मेलों का आयोजन भी किया जाता है। मेले में ढोलक और मंजीरों का एक साथ बजना समां बांध देता है। इस अवसर पर देवी-देवताओं को नदी-तालाब के किनारे ले जाकर इनकी पूजा की जाती है। सांयकाल इन मूर्तियों को वापस लाया जाता है। अलग-अलग शोभा यात्राएं निकाली जाती है, जिसमें भक्तजन भजन, कीर्तन, गीत गाते हुए खुश होकर डोल ग्यारस की खुशियां मनाते हैं। 
 
महत्व :
 
कृष्ण जन्म के ग्यारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है। जलवा पूजन के बाद ही संस्कारों की शुरुआत होती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को डोल में बिठाकर तरह-तरह की झांकी के साथ बड़े ही हर्षोल्लास के साथ जुलूस निकाला जाता है। इस दिन भगवान राधा-कृष्ण के नयनाभिराम विद्युत सज्जित डोल निकाले जाते हैं।

डोल ग्यारस के दिन यह व्रत करने से व्यक्ति के सुख-सौभाग्य में बढो़तरी होती है। डोल ग्यारस के विषय में यह भी मान्यता है कि इस दिन माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण के वस्त्र धोए थे। इसी कारण से इस एकादशी को 'जलझूलनी एकादशी' भी कहा जाता है। इसके प्रभाव से सभी दु:खों का नाश होता हैं। इस दिन भगवान विष्णु एवं बाल कृष्ण के रूप की पूजा की जाती हैं। जिनके प्रभाव से सभी व्रतों का पुण्य मनुष्य को मिलता हैं। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उसके हर संकट का अंत होता है।

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