dharma sangrah
✕

तुम चलत सहमित संस्फुरत !

Webdunia
गोपाल बघेल 'मधु'
तुम चलत सहमित संस्फुरत,
स्मित औ सिहरत प्रष्फुटत। 
परिप्रेक्ष्य लखि परिद्रश्य तकि,
पटकथा औ पार्थक्य लखि ।
 
उड़िकें गगन आए धरणि,
बहु वेग कौ करिकें शमन।
वरिकें नमन भास्वर नयन,
ज्यों यान उतरत पट्टियन ।
 
बचिकें विमानन जिमि विचरि,
गतिरोध कौ अवरोध तरि।
आत्मा चलत झांकत जगत,
मन सहज करि लखि क्षुद्र गति ।
 
आकाश कौ आभास तजि,
वाताश कौ भूलत परश।
ऊर्जा अगिनि संयत करत,
वारिधि की बाधा करि विरत ।
 
अहसास अपनौ पुनि करत,
विश्वास प्रभु सत्ता रखत।
'मधु' चेतना चित वृति फुरत,
चिर नियंता, आदेश रत।
Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

नवीनतम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शक्ति और सामर्थ्य से सार्थक हो रहा है भारत

चारधाम यात्रा: अटूट आस्था, VIP संस्कृति और व्यवस्थाओं की अग्निपरीक्षा

रूस दे रहा है नाटो को परमाणु हथियारों की धमकी, NATO कमांड केन्द्रों पर हो सकते हैं हमले

शारदीय नवरात्रि व्रत 2026: रोज-रोज साबूदाने की खिचड़ी खाने के 6 नुकसान

सबके लिए समय है... फिर अपने सपनों के लिए क्यों नहीं?

अगला लेख