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दिल्ली तक पहुंचा कश्मीर मॉडल, इंटरनेट बंदी से लेकर हिरासत तक

आतंकवाद के दौर से विरोध प्रदर्शनों तक पाबंदियों का लंबा इतिहास, सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर उठे सवाल

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Kashmir Model in Delhi: दिल्ली में प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए इंटरनेट सेवाओं पर रोक, आवाजाही पर प्रतिबंध और सुरक्षाबलों की तैनाती जैसे उपायों को लेकर जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की टिप्पणी ने एक पुरानी बहस को फिर हवा दे दी है। उनका कहना है कि जिस तरह के तौर-तरीके कभी कश्मीर में आम थे, अब वे दिल्ली तक पहुंच गए हैं। इस संदर्भ में ‘कश्मीर मॉडल’ किसी एक आधिकारिक नीति का नाम नहीं, बल्कि सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक सभाओं, संचार सेवाओं और आवाजाही पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के उस अनुभव का राजनीतिक वर्णन है, जिसका कश्मीर ने दशकों तक सामना किया है।
 
याद रहे कश्मीर में आतंकवाद शुरू होने के बाद 1990 के दशक से ही कर्फ्यू, निषेधाज्ञा, तलाशी अभियान, हिरासत और संचार प्रतिबंध सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। आतंकवादी हमलों, हिंसक प्रदर्शनों और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के दौरान प्रशासन ने इन उपायों को सुरक्षा के लिए जरूरी बताया। वहीं, राजनीतिक दलों, मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने इनके कारण आम जनजीवन, शिक्षा, कारोबार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाए।

जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन से पहले प्रतिबंध

इस बहस का सबसे बड़ा उदाहरण अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव और जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन से पहले लगाए गए प्रतिबंध हैं। उस समय मोबाइल, इंटरनेट और सार्वजनिक आवाजाही पर व्यापक पाबंदियां लगाई गई थीं। बाद में सेवाएं चरणबद्ध तरीके से बहाल हुईं। ब्राडबैंड और मोबाइल इंटरनेट की बहाली अलग-अलग चरणों में हुई, जबकि 4जी मोबाइल इंटरनेट सेवा जम्मू कश्मीर में 7 महीनों के उपरांत फरवरी 2021 में पूरी तरह बहाल की गई।
 
जम्‍मू कश्‍मीर में इंटरनेट बंदी का सिलसिला हालांकि केवल 2019 तक सीमित नहीं रहा। आतंकवाद विरोधी अभियानों, मुठभेड़ों और कानून-व्यवस्था संबंधी आशंकाओं के दौरान विभिन्न जिलों या क्षेत्रों में मोबाइल इंटरनेट की गति घटाने अथवा सेवा रोकने के आदेश भी जारी होते रहे हैं। ऐसी पाबंदियों का उद्देश्य अफवाहों और हिंसा के प्रसार को रोकना बताया गया, लेकिन इनके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी सामने आए। आनलाइन कारोबार, पत्रकारिता, विद्यार्थियों की पढ़ाई और डिजिटल सेवाओं पर इसका असर पड़ा।

दिल्ली और कश्मीर के हालात में अंतर

हालांकि दिल्ली और कश्मीर के हालात में एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। कश्मीर में प्रतिबंधों का इस्तेमाल लंबे समय से आतंकवाद और उग्रवाद से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों के संदर्भ में किया गया है, जबकि राजधानी में किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का औचित्य संबंधित घटना, प्रशासनिक आदेश और वास्तविक खतरे के आधार पर परखा जाना चाहिए। दोनों को पूरी तरह समान मानना तथ्यों को सरल बना देना होगा।
 
फिर भी उमर अब्दुल्ला की टिप्पणी एक बुनियादी सवाल उठाती है: क्या सुरक्षा के नाम पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध जरूरी, अनुपातिक और सीमित अवधि के हैं? लोकतंत्र में चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि विरोध का अधिकार और नागरिकों की रोजमर्रा की जिंदगी अनावश्यक रूप से बाधित न हो।

आंकड़ों में कश्मीर माडल

  • 447 इंटरनेट बंदी के मामले : इन मामलों पर नजर रखने वालों के संकलन के अनुसार, 2012 से 2026 तक जम्मू कश्मीर में इंटरनेट बंदी के 447 मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें 2019 में 55, 2020 में 116 और 2021 में 79 मामले दर्ज थे।
  • 213 दिन पूर्ण इंटरनेट बंदी : 5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू कश्मीर में लगभग 213 दिन इंटरनेट पूरी तरह बंद रहा। आंशिक या पूर्ण कनेक्टिविटी प्रतिबंधों की अवधि करीब 550 दिन तक पहुंची। 
  • 4जी की बहाली : पूरे जम्मू कश्मीर में 4जी मोबाइल इंटरनेट सेवा 5 फरवरी 2021 को बहाल की गई।

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