dharma sangrah

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

बाघ संरक्षण और पर्यावरण संतुलन

Advertiesment
Tiger Conservation
हमारे पर्यावरण के लिए सभी जीव-जंतुओं में बाघों का स्थान बहुत महत्वपूर्ण हैं। ये जीव पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने की अहम कड़ी हैं। इस दृष्टि से देखें तो जैव विविधता का संरक्षण और दुनियाभर में जंगलों को स्वस्थ्य रखने में भी इनका खास योगदान है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आइयूसीएन) ने इसे विलुप्ति की कगार पर खड़े जीवों की श्रेणी में रखा है। पिछली एक सदी में दुनियाभर से लाखों की संख्या में बाघ खत्म हो चुके हैं।
 
अनुमान है कि हमारे देश में भी सन 1900 के आरंभ में लगभग 1 लाख बाघ थे। महज सात दशक बाद वर्ष 1972 तक यह संख्या घटकर केवल 1,827 तक सिमट गई। लेकिन इस जीव की उपस्थित हमारे प्राकृतिक तंत्रों की सुरक्षा और संतुलन के लिए जरूरी है। यही कारण हैं कि पूरी दुनिया के लिए बाघ दिवस के भी खासे मायने होते हैं। इस दिन वैश्विक समाज प्रण लेता है कि जंगलों पर राज करने वाले बाघों को हम संरक्षित करेंगे और उनके फलने-फूलने लायक संसाधनों को निरंतर बनाए रखेंगे।
 
वैज्ञानिक तौर पर बाघ एक किस्म का शिकारी और परभक्षी जीवों की श्रेणी में शीर्ष स्थान पर आते हैं। बिग कैट फैमिली का यह शानदार जीव अपने प्राकृतिक आवासों के इर्दगिर्द मौजूद इकोसिस्टम के संतुलन को बनाए रखने में सहायक होते हैं। आंकड़ों की मानें तो अब दुनिया भर के जंगलों में लगभग 5,574 बाघ बचे हैं। इनकी 70 प्रतिशत आबादी भारत और आसपास के इलाकों में पाई जाती है। भारत का हृदय प्रदेश कहलाने वाला राज्य मध्यप्रदेश बाघों के संरक्षण के क्षेत्र में एक अग्रणी राज्य है। मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट के उपनाम से भी जाना जाता है।
 
मध्यप्रदेश में पेंच, पन्ना, कान्हा, बांधवगढ़, सतपुड़ा, संजय-दुबरी अभ्यारण्य भी बाघों के संरक्षण के लिए देशभर में पहचाने जाते हें। प्रदेश के बांधवगढ़ अभ्यारण्य में सबसे अधिक बाघ बताये जाते हैं। एक वक्त था जब लाओस, कंबोडिया और वियतनाम में बाघ पाए जाते थे। आज इन देशों में एक भी बाघ शेष नहीं बचा है। बाघों के संरक्षण की कहानी हमें संदेश देती है कि मानव समुदाय को प्रकृति में मौजूद हर प्रजाति के अस्तित्व का आदर करना चाहिए। दरअसल हर जीव-जंतु और वनस्पति का धरती पर मौजूद होना किसी दूसरी प्रजाति के पोषण और अस्तित्व के लिए आवश्यक है।
 
बाघों के प्राकृतिक और पर्यावरणीय महत्व को रेखांकित करते हुए कई प्रयासों में से एक विश्व बाघ दिवस मनाना भी है। दरअसल वैश्विक बाघ दिवस मनाने की शुरूआत हमारे प्राकृतिक वातावरण में मौजूद इस शानदार प्राणी की अहमियत को समझते हुए साल 2010 में रूस में सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित बाघ शिखर सम्मेलन से की गई। इस सम्मेलन में भारत सहित बाघों की उपस्थिति वाले 13 देश थे जिसमें भूटान, नेपाल, मलेशिया और बांग्लादेश आदि शामिल थे।
 
इस सम्मेलन का उद्देश्य इन देशों में बाघों की की घटती संख्या के प्रति वैश्विक जागरूकता पैदा करने और बाघों के संरक्षण के लिये सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देना था। भारत ने पर्यावरण संतुलन और बाघ संरक्षण को समझते हुए प्रोजेक्ट टाइगर नामक परियोजना साल 1973 में शुरू की । यह एक केंद्र सरकार समर्थित योजना है। इसके अंर्तगत देशभर के राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों को आश्रय प्रदान करता है। इसके अलावा साल 2005 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण जैसी वैधानिक संस्था को स्थापित किया गया।  
 
इन तमाम प्रयासों के बाद देश में बाघों की संख्या में इजाफा देखा गया है। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में बाघ बढ़े हैं। आज देश में 53 बाघ अभ्यारण्य हैं। टाइगर स्टेट का दर्जा हासिल करने वाले मध्य प्रदेश ने देश दुनिया में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में नेतृत्वकारी भूमिका का निर्वाह किया है। मध्य प्रदेश के लिए बाघ दिवस भी विशेष महत्व रखता है। सघन वन्य क्षेत्रों से आच्छादित  ग्रामीण परिवेश वाले इस प्रदेश के नागरिकों और सरकार ने मिलकर बाघों को बचाये रखने में बहुत परिवर्तनकारी कार्य किया है। निस्संदेह इसका श्रेय प्रदेश स्तर पर चलने वाली वन्य संरक्षण के अभियानों को जाता है। 
 
दरअसल बाघों का सिर्फ प्राकृतिक महत्व ही नहीं है बल्कि इस महत्वपूर्ण जीव की सांस्कृतिक अहमियत भी है। यह कई संस्कृतियों में एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसके अलावा भारत जैसे देशों में टाइगर सफारी एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण हैं। पर्यावरण पर्यटन के माध्यम से बाघों के निवास वाले अभ्यापरण्य राजस्व लोगों को आकर्षित करते हैं और इससे आस-पास के लोगों के लिए आजीविका के अवसर बनते हैं। एक तरह से देखें तो वन्य पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य प्रजातियों के संतुलन को बनाए रखने में बाघ बहुत ही मददगार साबित होते हैं। इसके साथ ही इस प्रजाति के सामाजिक पहलू भी हैं जो स्थानीय आबादी से सीधे जुड़े हैं।
 
बाघ एक ऐसा वन्यजीव है जिसके संरक्षण से पूरे वन्य क्षेत्रों का स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र बेहतर रहेगा और वहां जैव विविधता की दृष्टि से संतुलन स्थापित रहेगा। आज वैज्ञानिक शोध साबित कर चुके हैं। कि अगर जंगलों में बाघ सुरक्षित बचे रहेंगे तो मानव प्रजाति के लिए भी जल सहित कई अन्य प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रहेंगे। इस जीव के प्रकृति में फलने-फूलने से हमारी धरती की जैव विविधता भी संरक्षित रहेगी।
 
पिछले एक दो वर्षों में मीडिया की खबरों में कई इलाकों में बाघ अभयारण्यों में मानव-बाघ टकरावों की खबरें भी प्रमुखतो से प्रकाशित होती रही हैं। इसके अलावा कई कारणों से होने वाली बाघों की असामयिक मौतें भी चर्चा का कारण बनी हैं। आज बाघों के हालात दुनियाभर में अनेकों वजहों से चिंताजनक हैं। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक-दो दशको में सर्वाधिक 62 प्रतिशत से अधिक प्रौढ़ बाघों की मौतें हुई हैं। इसमें भी नर बाघों की मौतों का आंकड़ा 53.9 प्रतिशत रहा है।
 
दुनियाभर में शिकार और अन्य कारणों से बाघों की संख्या में गिरावट आ रही है। ऐसे में वैश्विक संस्थाओं और दुनियाभर के देशों की सरकारों को  बाघों की सुरक्षा और संरक्षण की दिशा में उचित कदम उठाने चाहिए। बाघ हमारी धरती पर प्रकति की एक नायाब प्रजाति है। इसका सरंक्षण वैश्विक समुदाय को मिलजुल कर करना आज के वक्त की सबसे बड़ी मांग है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

Guru Purnima Essay: हिन्दी निबंध: गुरु पूर्णिमा: गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता का महापर्व