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सुशांत सिंह राजपूत केस : जिसने नजर उठाई वही शख्स गुम हुआ

स्मृति आदित्य
इन दिनों दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां मेरे भीतर शोर मचा रही है। सोचती हूं कितनी दूर की दृष्टि रही होगी कवि की या कि तब ही उन्होंने ये माहौल देख लिया होगा.. पहले आप रचना पढ़ें- 
 
होने लगी है जिस्म में जुंबिश तो देखिए
इस पर कटे परिंदे की कोशिश तो देखिए 
गूंगे निकल पड़े हैं, ज़ुबां की तलाश में
सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए 
बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन
सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए 
उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें
चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिए 
जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ
इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए... 
 
बात अंतिम शेर से आरंभ करें तो यही कुछ आलम है मुंबई में इन दिनों... जिसने नजर उठाई वही शख्स गुम हुआ....सुशांत सिंह राजपूत की फैमेली फ्रेंड स्मिता पारीख को धमकी मिली है कि उनके बेटे का हश्र भी वही कर दिया जाएगा जो सुशांत का हुआ है। लगातार धमकियों के बाद अपनी जान को खतरा बताते हुए वे मुंबई से बाहर जाने का मन बना रही हैं। 
 
स्मिता पारीख वह पहली शख्स हैं जो सुशांत की तरफ से कई सारे राज लेकर सामने आई। उन्होंने बताया कि कितना प्रतिभाशाली था सुशांत, क्या उसके सपने थे, और कैसे वह दिशा केस के बाद डर गया था....वह सुशांत के लिए प्रेयर मीट भी रखती हैं और पूरे देश के साथ जानना चाहती हैं कि आखिर सुशांत के साथ हुआ क्या था... इसमें गलत क्या है? 
 
बात सिर्फ एक दो व्यक्ति की होती तब भी ठीक था, पिछले दिनों सौम्य लेकिन सशक्त पत्रकारिता कर रहे उज्जवल त्रिवेदी ने बार-बार कहा है कि उनकी आवाज को रोकने की कोशिश की जा रही है। पत्रकार शिवकांत गौतम कह रहे हैं कि उन पर दबाव बढ़ रहे हैं कि वे वीडियो बनाना बंद कर दे। अनुराग बिष्ट पहले दिन से सुशांत केस में अपने स्तर पर खुलासा कर रहा था उसने सीधे लेकिन मजाकिया लहजे में कहा कि अगर मैं किसी दिन अपना वीडियो लेकर न आऊं तो समझ लेना भाई का काम हो गया...
 
फरीदाबाद के फिटनेस एक्सपर्ट साहिल चौधरी के तू तड़ाक वाले वीडियो से आप भले ही सहमत न हो पर बॉलीवुड के भीतर की सच्चाई को सामने लाने का काम वह भी करता रहा है क्योंकि कभी वह स्वयं इसी का हिस्सा रहा है। पिछले दिनों उसे गिरफ्तार कर लिया गया है उसकी आखरी इंस्टा पोस्ट में उसने कहा कि दोस्तों मेरे साथ कुछ भी हो सकता है मुझे मुंबई पुलिस लेकर जा रही है। 
 
कभी पायल और कभी कंगना कहती है कि किसी दिन में लटकी पाई जाऊं तो ये मत समझना कि मैंने आत्महत्या की है.... आखिर यह सब क्या है? कितनी अराजकता का माहौल है? कितनी असुरक्षा और असभ्यता चल रही है? बोलने की आजादी का यह हनन खुले आम चल रहा है। असहिष्णुता की नई परिभाषा रचने वाले मेरे वे साथी कहां गए जिन्हें भारत में रहने से डर लगने लगा था... जो असहिष्णु भारत का हैश टैग चला रहे थे... उन्हें बताना चाहती हूं इसे कहते हैं असहिष्णुता - इनटॉलरेंस... किसी ने किसी पक्षी का नाम भी ले दिया तो वह मार दिया जाएगा, उठा लिया जाएगा, किसी कार्टून के शेयर करने पर सेना के अधिकारी पीट दिए जाते हैं.... 
 
अर्नब गोस्वामी की चीखती पत्रकारिता आपको भले बुरी लगे लेकिन अगर यह चीख नहीं होती तो आज बहरे यूं बावले से नहीं घूम रहे होते... उसे लगातार धमकियां मिल रही है, झूठे केस में फंसाया जा रहा है। उन्हीं के एक पत्रकार को किसी फार्म हाऊस तक पंहुच जाने की सजा मिली है। 
 
उधर और सूत्रों की माने तो 14 जून सुशांत की मौत के बाद से कितनी ही रहस्यमयी मौते हुई हैं। एक्सीडेंट से लेकर ‍डिप्रेशन और छद्म आत्महत्या ‍तक... मुंबई में युवाओं का एक समूह है जिसने इन सारी मौतों पर रिसर्च किया है जो सुशांत की मौत से सीधा कनेक्शन रखती है। यह समूह 14 पोस्टर लेकर लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं ता‍कि सुशांत की मौत को समझने की और उस पर सवाल उठाने की मुहिम में आम जन को शामिल कर सके। 

दिशा सालियान व सुशांत के अलावा समीर बांगड़ा, समीर शर्मा, स्टीव पिंटो, मनमीत ग्रेवाल, जैसे कई नाम इसी रहस्यमयी मौत का शिकार हैं। कोई नहीं जानता असल में क्या हुआ इनके साथ....   
 
सुशांत के ‍कोरियोग्राफर मित्र गणेश और पूर्व मैनेजर अंकित आचार्य लगातार अपनी जान को खतरा बता रहे हैं....इतने खौफजदा नाम आ रहे हैं कि अब तो यूं भी आम जन की रूचि और ज्यादा इस बात को जानने में बढ़ गई है कि आखिर ऐसा क्या है जिसे दबाने के लिए रहस्यमयी मौतों की संख्या बढ़ाई जा रही है। 
 
ऐसा क्या है जिसे छुपाने के लिए खुलेआम खून का खेल रचा जा रहा है, ऐसा कौन है जिसे बचाने के लिए पूरा प्रशासनिक अमला, पूरा पुलिस विभाग, पूरी राजनीतिक क्षमता झोंक दी जा रही है... हर किसी से खतरा है, कोई ट्विट कर दे तो खतरा, कोई फेसबुक पर लिख दे तो खतरा, कोई मीम बना दे तो खतरा, कोई कार्टून शेयर कर ले तो हमला, कोई वीडियो बना दे तो बलवा.... 
 
ये सिलसिला कहां जा कर थमेगा.... ये कैसे असुरक्षित माहौल में रही है मुंबई.. जो लोग पैपराजी से परेशान हैं, वल्चर की बात करते हैं उन्हें भी तो पता होगा कि अंडरवर्ल्ड, माफिया, ड्रग्स, नशा, धमकी, वसूली, हत्या जैसे शब्द मुंबई के 'कल्चर' में जबरिया शामिल कर दिए गए हैं।
 
फिर सिर्फ उन्हें तब ही क्यों कुछ कहना होता है जब किसी अभिनेत्री के 'प्राइड' की बात आती है, जब किसी के 'लिंचिंग' हो जाने की शंका होती है, जब किसी इंटरव्यू में मुख्य संदेही कहे कि ''तो क्या हम आत्महत्या कर लें, फिर कौन जिम्मेदार होगा...''
 
यहां तो बस कहा और कुछ हितैषी की पेशानी पर बल आ गए कि अगर उसे कुछ हो गया तो ... अरे भाई उसे तो तब होगा जब होगा.. ना जाने कितने मारे जा रहे हैं, मारे जा चुके हैं, मारे जाने की धमकियां दी जा रही हैं... उन पर भी नजरे इनायत कर लो.. क्यों किसी एक बंदे का मर जाना सामान्य बात है और किसी के लिए मरने की आशंका भी 'खास'....

माना कि आपको सुशांत में दिलचस्पी नहीं, माना कि आपको दिशा की मौत में कोई रहस्य नजर नहीं आता और माना कि आपकी विचारधारा आपको इन सबके विरूद्ध खड़ा करती है लेकिन बात यहां एक पूरे शहर की आबोहवा के बिगड़ने की है। पूरे शहर से सच और इंसाफ के छले जाने की है.... अब भी अगर हम अपनी-अपनी पतंगे ही उड़ाते रहे तो याद रखिए एक शब्द है 'पोएटिक जस्टिस'.. वह लौट कर आता ही है हर किसी की जिंदगी में.... 
 
कबूतर की तरह आंखें बंद कर लेंगे तो बिल्ली नहीं दिखाई देगी... इस भ्रम से बाहर आइए.... 
 
दुष्यंत के ही उसी शेर से बात खत्म कर फिर वही सोच, वही चिंतन रख रही हूं.... 
 
जिसने नज़र उठाई वही शख़्स गुम हुआ
इस जिस्म के तिलिस्म की बंदिश तो देखिए...   

इस समय अहमद फ़रहाद की यह रचना भी यहां मौजूं है कि-  
 
काफ़िर हूं सर-फिरा हूं मुझे मार दीजिए
मैं सोचने लगा हूं मुझे मार दीजिए
है एहतिराम-ए-हज़रत-ए-इंसान मेरा दीन
बे-दीन हो गया हूं मुझे मार दीजिए
मैं पूछने लगा हूं सबब अपने क़त्ल का
मैं हद से बढ़ गया हूं मुझे मार दीजिए
करता हूं अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से सवाल
गुस्ताख़ हो गया हूं मुझे मार दीजिए
ख़ुशबू से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम
कितना भटक गया हूं मुझे मार दीजिए
मा'लूम है मुझे कि बड़ा जुर्म है ये काम
मैं ख़्वाब देखता हूं मुझे मार दीजिए
ज़ाहिद ये ज़ोहद-ओ-तक़्वा-ओ-परहेज़ की रविश
मैं ख़ूब जानता हूं मुझे मार दीजिए
बे-दीन हूं मगर हैं ज़माने में जितने दीन
मैं सब को मानता हूं मुझे मार दीजिए
फिर उस के बा'द शहर में नाचेगा हू का शोर
मैं आख़िरी सदा हूं मुझे मार दीजिए
मैं ठीक सोचता हूं कोई हद मेरे लिए
मैं साफ़ देखता हूं मुझे मार दीजिए
ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहता हूं साफ़ ज़ुल्म
क्या ज़ुल्म कर रहा हूं मुझे मार दीजिए
ज़िंदा रहा तो करता रहूंगा हमेशा प्यार
मैं साफ़ कह रहा हूं मुझे मार दीजिए
जो ज़ख़्म बांटते हैं उन्हें ज़ीस्त पे है हक़
मैं फूल बांटता हूं मुझे मार दीजिए
बारूद का नहीं मिरा मस्लक दरूद है
मैं ख़ैर मांगता हूं मुझे मार दीजिए...
 

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