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शर्म करो शरद....बेटी को तो बख्श दो

स्मृति आदित्य
शरद यादव जैसे नेताओं के बयान यूं तो इस योग्य नहीं होते हैं कि उन पर टिप्पणी की जाए लेकिन जब बात बेटियों की आती है तो हम विवश हो जाते हैं यह सोचने के लिए कि देश के गणतंत्र को 68 वर्ष हो रहे हैं और आज तक हम एक 'जिम्मेदार' कहे जाने वाले नेता को 'इज्जत' शब्द का अहसास नहीं करा सके हैं।

शरद यादव के अनुसार एक वोट की इज्जत बेटी की इज्जत से कहीं ज्यादा है। राजनीति में नीति शब्द अब अपने मायने खो चला है। नैतिकता, मर्यादा और गरिमा जैसे शब्द अपनी अर्थवत्ता के साथ गायब हो गए हैं। भाषिक अशिष्टता और अवशिष्टता का यह कैसा दौर है कि हम अपनी जुबान से कुछ भी कभी भी और किसी के लिए भी झर देते हैं। विवादित बयानों से शरद का पुराना नाता है। इ ससे पहले भी वे संसद में दक्षिण भारत की महिलाओं पर घटिया टिप्पणी कर चुके हैं। स्त्री को लेकर उनकी सोच गाहे-बेगाहे जाहिर होती रही है लेकिन अब तो पतन की पराकाष्ठा हो रही है। बदलते दौर का यह शर्मनाक सच है कि 'इज्जत' शब्द सिर्फ स्त्री से ही जोड़ कर क्यों देखा जाता है? 
 
चाहे बलात्कार का मुद्दा हो या बयानों का, चाहे घर का मामला हो या बाहर का, क्या इज्जत सिर्फ स्त्रियों की ही होती है और वही इसे गंवाती है...क्या पुरुषों की कोई इज्जत नहीं होती? बलात्कार में एक स्त्री तो छली जाती है जबरन या धोखे से फिर उसने कैसे इज्जत गंवाई जिस 'का'पुरुष ने उसके साथ ज्यादती की है वही इज्जतदार नहीं था तभी उसने वह कृत्य किया है। 'इज्जत' शब्द की निरंतर की जुगाली करने वाले भी यह नहीं जानते कि उनके लिए इसके मायने क्या हैं और मानदंड क्या हैं? 
 
य ह सच है कि मान सम्मान कमाया जाता है मिलता नहीं है लेकिन भारतीय संस्कृति में स्त्री को यह मान सम्मान पुरुषों से अधिक मिला है और इसकी वजह है उसके नैसर्गिक प्रकृति प्रदत्त गुण। व ह मां के रूप में त्याग के प्रतिमान गढ़ती है, पत्नी के रूप में सहचरी होकर नया संसार रचती है, और बेटी के रूप में आंगन की कली बनकर दिलों में सजती है। हर रूप में उसकी प्रतिष्ठा इसीलिए विशिष्ट है कि वह उपमाओं और उपमानों से कहीं आगे अपना शीर्ष स्थान खुद तय करती है। यह सोच की विकृति है कि हमारे लिए वह बयानों को सनसनीखेज बनाने का जरिया है, वह हमारे लिए चौराहों की चर्चा का सबब है। नेता से लेकर अभिनेता तक सबके लिए वह रस का विषय होती है तभी तो कभी सलमान अपनी थकान की तुलना रेप की हुई स्त्री से कर डालते हैं तो कभी शरद जैसे नेता वोट की इज्जत को बेटी की इज्जत से अधिक बता कर गौरवान्वित महसूस करते हैं। शर्म करो शरद....पता है कि तुम्हें सत्ता सुख या मीडिया की सुर्खियां चाहिए पर कम से कम बेटी को तो बख्श दो.. ..  
 

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