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कोमल देह पर प्रहार, आखिर क्या है सार ?

प्रीति सोनी
जितनी बार उस बच्चे की मासूम सूरत टीवी पर देखी, कुछ और नहीं सिर्फ यही सवाल मन में रहा...कि कौन होगा वह अमानवीय पाषाण जिसका मन एक बार भी नहीं पसीजा...इतनी मासूम शक्ल को देखकर...उसकी कोमल देह पर चाकू चलाने वाले वे हाथ कितने ही कठोर हों, पर किसी सजीव देह के ही होंगे न! 
 
सिर्फ प्रद्युम्न की मां, उसे पिता ही नहीं पूरे समाज के मन में यही सवाल है, कि शिक्षा का वह मंदिर जहां कोई भी पालक बेफिक्र होकर अपनी संतान को भेजता है, वह भी अब सुरक्षित नहीं है। यही बात आज हर दिमाग में कौंध रही है और हर मां के मन में एक अनजाने भय को जन्म दे रही है। अब वह अपने बच्चे को कहीं भी भेजने से पहले आशंकित है, क्योंकि सबसे सुरक्षित स्थान भी अब छलने लगे हैं।
 
सिर्फ पालक ही नहीं, बल्कि समाज का हर शख्स इस बात से गुस्साया हुआ है कि इतनी मोटी फीस, हर दबाव के वाबजूद वे बच्चों को सुरक्षा मुहैया नहीं करवा पा रहे, तो आखिर कोई क्यों भेजे अपनी संतान को तैयार कर, पढ़ने या किसी औचक दुर्घटना का शिकार होने के लिए? पालकों पर स्कूल की फीस से लेकर, यूनि‍फॉर्म, किताबें, खान-पान जैसी कई नियमावलियां जारी की जाती है, जिसके पालन का अच्छा खासा दबाव भी होता है उन पर...कई पालक अपनी हैसियत से बढ़कर, अपनी क्षमताओं के पार जाकर बच्चे के भविष्य को गढ़ने में स्कूल का साथ देते हैं, लेकिन स्कूल प्रशासन आखिर क्यों बच्चों से जुड़ी आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर पा रहे?
 
बेशक इस वक्त पूरा देश उस मां की पुकार को सुनकर व्यथित है, जिसका लाल स्कूल प्रशासन की घोर लापरवाही की भेंट चढ़ गया। एक मां के साथ आज पूरा देश इंसाफ के साथ-साथ सुरक्षा का वादा मांग रहा है... कि फिर कोई मासूम निरअपराध प्रघुम्न न हो किसी गंदी सोच का शिकार...। सवाल कई हैं। सवाल यह है कि क्या वाकई अब बच्चा स्कूल में सुरक्षित नहीं? सवाल यह है कि स्कूल प्रशासन कहां था उस वक्त, जब कोई दरिंदा उस मासूम के साथ हैवानियत कर रहा था? सवाल यह है कि क्या वाकई कत्ल कंडक्टर ने ही किया है? सवाल यह है कि उस मासूम का आखिर कसूर क्या था? सवाल यह है कि इस गैरजिम्मेदाराना हरकत की जो कीमत उस बच्चे ने चुकाई, उसे या ऐसे माता-पिता को कभी न्याय मिल पाएगा?
 
इतने बढ़े हादसे के बाद भी जवाबदेहिता नजर आती नहीं दिख रही। मानवता को परे रखकर राजनीति के चेहरे से बेशर्म बयान देते लोग यह भूल चुके हैं कि एक निरपराध, अबोध, मासूम बच्चा किसी भी तरह की राजनीति से ऊपर है...राजनीति से ऊपर होना चाहिए उस मां का दर्द और पुकार जिसने अपने 7 साल के मासूम को खोया है...अपनी आंख के तारे, जिगर के टुकड़े और अपने आंगन के खिलौने को खोया है...। सिर्फ यही एक मामला नहीं, बल्कि राजनीति से ऊपर होना चाहिए हर वह फैसला, जो न्याय से जुड़ा है...किसी की जिंदगी से जुड़ा है...न निभाई गई उन जिम्मेदारियों से जुड़ा है जो पर्दे के पीछे से या तो मुंह चिढ़ा रही हैं या फिर समाज के लिए खतरा बनकर झांक रही हैं। 

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