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क्यों जरूरी हो जाता है इंटरनेट पर बैन?

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
# माय हैशटैग
मंदसौर में पिछले दिनों हुई हिंसक वारदातों के बाद मंदसौर और उससे जुड़े जिलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बैन कर दिए गए। व्‍हाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर सब बंद। इसके कुछ समय बाद इंटरनेट पर ही पाबंदी लगा दी गई। प्रशासन फिर भी संतुष्ट नहीं हुआ, तो कुछ इलाकों में 2जी और 3जी सेवाएं भी बंद कर दी गईं। सहारनपुर में भी दंगों के दौरान यही व्यवस्था की गई। न सोशल मीडिया, न इंटरनेट, न मोबाइल। कश्मीर में तो यह आए दिन होता रहता है। 
इंटरनेट और मोबाइल पर बैन करने के मामले में भारत दुनिया में टॉप पर है। पिछले पांच साल में 80 बार से ज्यादा इंटरनेट सेवाएं बाधित की गईं। सुरक्षाबलों को जानकारी मिली थी कि कश्मीर में व्‍हाट्सएप का उपयोग आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, वहां करीब 300 व्‍हाट्सएप ग्रुप हैं, जो हिंसक वारदातों के लिए समन्वयक की भूमिका में रहते हैं, इसी कारण पूरे प्रदेश में एक साथ कई जगह हिंसक प्रदर्शन होते हैं। पिछले दिनों सैन्यबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया एक आतंकी भी अपने मोबाइल से पत्थरबाजों को बुलावा दे रहा था, लेकिन आधी रात के बाद उसे इन संदेशों पर सकारात्मक जवाब नहीं मिल पाया। चिंताजनक बात यह है कि कश्मीर के कई व्‍हाट्सएप ग्रुप के सदस्य हिंसक गतिविधियों के लिए सीमा पार बैठे पाकिस्तानी आकाओं से मार्गदर्शन लेते हैं। 
 
इंटरनेट पर बैन लगने से आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं। ऑनलाइन भुगतान जैसी सेवाएं भी इसकी चपेट में आ जाती हैं। सहारनपुर में जातीय दंगे भड़काने में सोशल मीडिया का उपयोग किया गया है। स्मार्टफोन आने के बाद होने वाली हिंसक वारदातों और आगजनी की घटनाओं की वीडियो बनाना आसान हो गया है और उन वीडियो को प्रचारित-प्रसारित करना भी।
 
सोशल मीडिया पर प्रतिबंध नहीं लगाने और उस पर सख्त निगरानी करने के अपने फायदे हैं, जैसे पिछले दिनों मारे गए एक दुर्दांत आतंकवादी तक सुरक्षाबल उसके इंटरनेट कनेक्शन के कारण ही पहुंच पाए। जब उस आतंकवादी को लगा कि वह घेरा जा चुका है, तब उसने सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ के बजाय व्‍हाट्सएप ग्रुप पर पत्थरबाजों को संदेश भेजना शुरू किए। वह लगातार दस घंटे तक पत्थरबाजों को संदेश भेजता रहा और सैन्यबलों के सामने रुकावट डालने की आशा में समय व्यतीत करता रहा। सुरक्षाबलों की गोलीबारी का उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसे लगता था कि ऐसा करने से सुरक्षाबलों को यह भ्रम हो सकता है कि वह आतंकवादी छुपा हुआ नहीं है, लेकिन उसके सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के कारण उस तक पहुंच पाना आसान हुआ। 
 
इंटरनेट पर बैन करने के मामले में भारत के अलावा कई देश हैं। इथियोपिया में तो वहां की सरकार ने परीक्षा के दिनों में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया था। इथियोपियाई सरकार को लगता था कि परीक्षाओं के दौरान नकल का उपयोग करने के लिए लोग व्‍हाट्सएप, इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसी सेवाओं का उपयोग धड़ल्ले से करते हैं। अल्‍जीरिया में भी परीक्षाओं में नकल करने के लिए इंटरनेट की मदद ली जाती है। इसके अलावा परीक्षा का पेपर लीक करने के लिए भी इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग जमकर होता है। अल्‍जीरिया में कुछ छात्रों ने सोशल मीडिया पर परीक्षा का पेपर लीक कर दिया, तो ग्रेजुएशन की सभी परीक्षाएं रद्द कर दी गईं। 
 
कश्मीर में एक महीने का इंटरनेट और मोबाइल बैन हटा ही था कि आतंकवादी सब्‍जार की मौत के बाद उसे फिर लागू कर दिया गया। सहारनपुर में भी वहां जातीय हिंसा भड़कने के बाद इंटरनेट बाधित कर दिया गया। वहां तो लोग मोबाइल पर भी बात नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि मोबाइल सेवाएं भी ठप कर दी गई हैं। हिंसक वारदातों में सोशल मीडिया का उपयोग रोकने के लिए सरकार को सोशल मीडिया और इंटरनेट पर अपनी निगरानी के तरीके बदलने चाहिए और ज्यादा चुस्ती-फुरती दिखानी चाहिए। भारतीय सैन्यबलों से जुड़े सभी जवानों और अधिकारियों के लिए सोशल मीडिया पर उपस्थित होने पर रोक है, लेकिन फिर भी उनके परिवार वाले किसी न किसी तरीके से सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं।
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