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मानवीय सवालों की सुनामी में बढ़ती समाधान शून्यता!

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tsunami of questions
बहुआयामी लोकतांत्रिक व्यवस्था हो या सैनिक शासन सहित चाहे राजशाही भी क्यों न हो किसी भी तरह की शासन व्यवस्था नित नये अनसुलझे या खड़े हो रहे सवालों के बोझ तले तेजी से सारी मनुष्य निर्मित व्यवस्थाएं एक तरह से ढहती जा रही है या समाधान शून्यता की दिशा में निरंतर बढ़ती ही जा रही है। यह पुरातन से लेकर आजतक के आधुनिक कालखंड का खुला सत्य है। वैसे सत्य तो हमेशा सत्य ही होता है सत्य के साथ कोई विशेषण नहीं लगता। पर भारत जैसे दार्शनिक विरासत और पंरपरा वाले अंतहीन विविधता और बहुलता वाले देश में भी सवालों की सुनामी तो दिन-प्रतिदिन गहराती ही जा रही है और साथ ही साथ समाधान शून्यता का ग्राफ भी दिन प्रतिदिन फैलता या बढता ही जा रहा है। आज के कालखंड में बुनियादी सवालों के सहज समाधान क्यों नहीं मिल रहे है?
 
पहले और आज मे एक मौलिक अंतर तो यह हुआ है कि पुरानी या प्रागैतिहासिक दुनिया में सवाल कम थे और जीवन जीने के साधन भी बहुत कम थे फिर भी समाधान खोजने में और चुनौतियों से जूझते हुए जीवन जीने का रोमांच बहुत अधिक था। ऐसा इसलिए था कि मनुष्य मन में उठने वाले सवाल मनुष्य मन को चुनौतियों से निपटने का रास्ता भी बताता था। आधुनिक सभ्यता में मौलिक अंतर यह उठ खड़ा हुआ है कि मनुष्य मन में जो सवाल उठ खड़े होते हैं उनका समाधान अकेले मनुष्य और शासन व्यवस्था दोनों के पास नहीं है। क्योंकि मनुष्य निर्मित साधनों का अंबार खड़ा हो गया है और प्राकृतिक रूप से जीवन में मिले तन और मन के साधनों की सनातन शक्ति को आज का मनुष्य और उसकी व्यवस्था अपनी स्मृति से विस्मृत कर चुकी हैं।
 
शुरुआती सभ्यता में अकेला मनुष्य अपने एकाकी प्रयास पर आधारित जीवन जीने से ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था पर आज की भीड़ भरी दुनिया में सब कुछ वैश्विक हो रहा है अकेला मनुष्य अकेले अपना जीवन नहीं जी सकता।आज के मनुष्य के पास खुद के प्रयास से ज्यादा राज या शासन व्यवस्था के भरोसे या मदद के बिना जीवन जीने का कोई उपाय लगभग संभव नहीं रहा है। मनुष्य अपने जीवन काल में क्या खाए, क्या करे और कैसे जीवन व्यतीत करे? यह अकेले मनुष्य मन का खेल नहीं रहा है राज-काज की कार्यप्रणाली की जकड़न में मनुष्य का जीवन उलझ गया है। अकेला मनुष्य सब कुछ कर सकता हैं पर अकेला चाहकर भी सूकून के साथ जी नहीं सकता है।
 
सरल जीवन विकास के नाम पर जटिल से जटिलतम होता ही जा रहा है। यही वर्तमान काल की सबसे चुनौतीपूर्ण परिस्थिति है जिससे न तो अकेला मनुष्य और न ही समूची दुनिया कोई उपाय खोज पा रही है।आज के विकसित देशों और लगातार विकासशील देशों में जिस तरह से जीवन यापन कर सकना साधनों की प्रचुरता के बाद भी सरल सहज नहीं रह पा रहा है। आर्थिक संपन्नता मात्र से जीवन के मूलभूत सवालों को हल करने लायक आधुनिक काल का मनुष्य रहा नहीं है। आधुनिक काल की संपन्न दुनिया में परिवहन के साधनों की संख्या ज़मीन और आकाश दोनों में दिन दूनी रात चौगुनी अराजक गति से बढ़ती ही जा रही है। इस कारण विकासशील देशों की पुरानी बसाहटें अनियंत्रित एवं अराजक यातायात व्यवस्था में या निरंतर वाहनों की भीड़ में बदलती जा रही हैं।
 
एक और बड़ा बदलाव दिन दूनी रात चौगुनी गति से हो रहा है कि सब इस अराजक स्थिति में चुपचाप जी रहे हैं और जीवन में आने वाले बुनियादी सवालों से नजरें चुरा रहे हैं। सवालों की चुनौती को अपने जीवन काल में समझ कर रास्ता निकालना ही मनुष्य जीवन की जीवनी शक्ति माना गया है। यदि मनुष्य समाज अपने वर्तमान काल की चुनौतियों का हल नहीं खोज पाए तो इसमें चुनौतियों की जटिलता न होकर मनुष्य जीवन की अकर्मण्यता ही माना जाएगा।काल से नजरें चुराकर आठ अरब जीवित मनुष्य तकनीकी अर्थ में जिन्दा भले ही माने जावें पर पर जिन्दा होकर भी पूरी जिंदादिली एवं पूर्णता से जी ही नहीं पा रहे हैं।
 
समूची दुनिया में मनुष्य ही अकेला जीव या प्राणी है जिसने समूची दुनिया में अपनी बुद्धि और कृतित्व से अंतहीन परिवर्तन किए हैं। मानव समाज को चलाने वाले बुनियादी ढांचे को खड़ा कर व्यवस्था बनाई है पर मनुष्य द्वारा सोची और निर्मित व्यवस्था आज वैसे काम नहीं कर पा रही है जैसा मनुष्य ने आदिकाल से आज तक सोचा था। यही प्राकृतिक दुनिया और मनुष्यकृत दुनिया का भेद है। मनुष्य द्वारा निर्मित व्यवस्था या विचार या स्वरूप हमेशा या मनुष्य द्वारा निर्मित नियम या व्यवस्था अनुसार नहीं हो सकता पर प्राकृतिक व्यवस्था सदैव या अपने सनातन स्वरूप में यथावत स्वरूप में गतिमान बनी हुई है। मनुष्य प्रकृति का अंश है प्रकृति का नियंता नहीं।
 
इसी से मनुष्य के मन में जो व्यवस्था खड़ी होती है उसके अनुसार मनुष्य का कृतित्व तो निर्धारित होता रहता है। पर प्रकृति के स्वरूप पर उसका कोई सर्वकालिक प्रभाव नहीं पड़ता। प्रकृति में न तो सवाल उठते है और न ही समाधान खोजने की कोई व्यवस्था है। सब कुछ अपने आप होता ही रहता है। प्रकृति का अपना प्राकृतिक चक्र है जो निरंतर जारी है। उसमें मनुष्य व्यवधान नहीं उत्पन्न कर सकता युद्ध भी मनुष्य के मन की उपज हैं जबसे दुनिया बनी असंख्य युद्ध छोटे बड़े स्वरूप में हो चुके हैं पर लड़ने वाले लोग थक कर युद्ध बंद कर देते हैं या युद्ध को हल मानने वाले थक कर युद्ध बंद कर देते हैं। युद्ध प्राकृतिक स्थिति नहीं है। युद्ध तो मनुष्य मन की असफलताओं का नंगा नाच है।
 
इस तरह हम मान सकते हैं प्रकृति में न कोई सवाल है न ही समाधान खोजने का कोई उपाय। प्रकृति अपने आप में पूर्ण हैं और पूर्ण में कोई अपूर्णता नहीं कोई सवाल नही कोई समाधान नहीं। जैसे सत्य हमेशा से सत्य ही हैं इसमें कोई घट-बढ़ नहीं है। मनुष्य प्रकृति का अंश है और अंश प्रकृति से एकाकार हो ही अपना जीवन व्यतीत कर सकता हैं। प्रकृति का अपना चक्र नहीं बदल सकता।
 

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