Publish Date: Wed, 05 Aug 2026 (12:40 IST)
Updated Date: Wed, 05 Aug 2026 (13:06 IST)
Indian culture: भारत विविधताओं का लोकसागर है। भारतीय लोक समाज, सागर जैसी विशालता के साथ ही साथ लोकजीवन में समायी अंतहीन विविधताओं का जीता-जागता संग्रहालय हैं। हमारा देश भारत, लोकजीवन की अंतहीन विविधताओं का गहरा जमावड़ा है। यहां खानपान, सोच विचार,रहन सहन, वेशभूषा, भाषा बोली -लिपियों, चिन्तन परम्परा से लेकर स्थापत्य, विचारधारा,दर्शन, धर्म संस्कृति और समाज में अनेक मत मतान्तरों, लड़ाई-झगड़ों सहित विविध साकार निराकार विचारों का अंतहीन सिलसिला सनातन समय से है। आधुनिक काल में कई एकांगी समूह, संगठन और विचारधाराएं भारत की विविधताओं से अपने अन्तर्मन में विचलित होकर भारत की विविधताओं को बिखराव की संज्ञा देती हुए दिखाई देती हैं। भारत की वैचारिक विविधताओं को भी इस विविधता विरोधी एकांगी विचार प्रक्रिया पर भी कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि सारी विविधताएं एक तरह से विचारों का विस्तार ही तो है! विविधताओं से असहमति भी विविधता मय जीवन का एक वैचारिक आयाम ही समझा जाना चाहिए।
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एक विचार यह भी उभारने की पहल हो रही है कि विविधताओं से एकता कमजोर होती है। सब कुछ एक जैसा होना चाहिए। भाषा भूषा, खान पान,सोच विचार, दर्शन धर्म, बोल चाल, हाव भाव सब कुछ एक जैसा होना चाहिए। यदि इस भारत देश और दुनिया में सब कुछ एक जैसा हो जाय तो अंतहीन नए विविधतापूर्ण सोच-विचार और सृजनात्मक गतिविधियों को तो एक तरह से यांत्रिक एकरस जड़ता में ढलना ही होगा। जीवन कभी भी एक रस नहीं हो सकता, साथ ही एक मार्गी और एकांगी भी नहीं हो सकता है। जीवन की चेतना, सहज विस्तार और प्राकृतिक समृद्धि का पर्याय है उसकी अंतहीन विविधता। विविधता पूर्ण जीवन की चेतना से ही लोक जीवन और जगत हर क्षण नवीनता और विविधता से भरपूर बना रहता है। यही प्राकृतिक जीवन का आनंद हैं।
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प्रकृति में कुछ भी एक जैसा नहीं है।साथ ही कुछ भी प्रवाहहीन या गतिहीन भी नहीं है, सबकुछ एक दूसरे से भिन्न भी है फिर भी सब कुछ अभिन्न भी हैं। विभिन्नता बाह्य स्वरूप है, अभिन्नता आत्म स्वरूप है, साथ ही साथ निरंतर गतिशील भी। एक ही पेड़ की दो पत्तियां एक जैसी नहीं होती एक जैसे दो जीव नहीं होते। जीव भिन्न है जीवन अभिन्न हैं। विविध विचारों विषयों और विधाओं से ही मानवीय सभ्यता का विस्तार होकर वैचारिक समृद्धि और समझ का दायरा निरन्तर प्रवाहित होता है। यदि सारी दुनिया एक तरह के या एक जैसे यांत्रिक सांचे में ढली होती तो दुनिया नीरस और उदासी भरी एकरसता का यंत्रवत विस्तार मात्र ही बनी रहती। आज समूची दुनिया में जो विभिन्नता का अनन्त विस्तार है इसी से समूची दुनिया एक तरह से विविध रूप स्वरूप के अनन्त महासागर जैसी दिखाई देती हैं।
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हमारी इस धरती पर जो भूमि या भूभाग हैं उसकी विविधताओं का कोई अंत नही है। कहीं विशाल पर्वत श्रृंखला है तो कहीं विशाल वीराने या सन्नाटे समेटे जन एवं वनस्पति रहित रेतीले रेगिस्तान, तो कहीं धनधोर वन प्रान्तर का विशाल साम्राज्य। इसके अलावा हमारी धरती में महासागरों के रूप में जो विशाल जलराशि का विस्तार है, उसमें जिस जीव और वनस्पति जगत का अंतहीन विस्तार है वह या उसकी विविधता हमारी कल्पना से परे है। महासागर की जलराशि में मौजूद जीवन के विस्तार को देखते हुए हम कह सकते हैं कि हमारी धरती में हूबहू एक जैसा दूसरा कोई जीव या वनस्पति मौजूद ही नहीं है।
सब कुछ अपने आप में अनोखा और अंतहीन जीवन श्रृंखला का साकार स्वरूप जैसा ही है। यानी धरती पर जीवन का स्पष्ट संकेत या संदेश विविधतापूर्ण जीवन चिंतन और मनन के लिए है। तभी तो समूचा जगत और जीवन अंतहीन विविधताओं के जीते-जागते संग्रहालय जैसा लगता है जिसे कोई भी जीव अपने जीवन काल में समग्र रूप से देख,समझ और अनुभव भी नहीं कर पाता है। भारत में मौजूद विविधताओं के अंतहीन विस्तार की समूची कल्पना भी मनुष्य के मन में अपने समूचे जीवन काल में नहीं आ पाती है। हमारी धरती और मनुष्य के मन में विविधताओं का कोई ओर-छोर नहीं है कोई थाह ही नहीं है। हमारी गणना समाप्त हो सकती है पर धरती के जल,थल और जीवन में मौजूद विविधताओं का अंत और अस्तित्व समाप्त नहीं हो सकता है।
हमारी इस धरती पर वनस्पति जगत की उत्पत्ति अपने आप प्राकृतिक रूप से एक निश्चित समय चक्र में अपने आप होती रहती है। इस तरह अपने आप अंकुरित होने वाली वनस्पति में अंतहीन विविधताओं के दर्शन होते हैं। पर मनुष्य द्वारा तयशुदा फ़सल चक्र में जो बीज बोया जाता है वहीं फ़सल के रूप में अंकुरित हो अनाज के रूप में हमें मिलता है। मनुष्य के द्वारा फसल या अनाज के रूप में बोया गया बीज तो उस रूप में उगता ही है पर उसके साथ साथ असंख्य वनस्पतियों की अन्य प्रजातियां भी प्राकृतिक रूप से अंकुरित हो कर कई तरह की वनस्पतियों को जन्म देती है।
हम अपनी उपयोगिता या लाभ हानि के लिए एकांगी स्वरूप का मनचाहा बीज बोते हैं। पर प्रकृति जीवन के हर आयाम में ऐसी-ऐसी विविधताओं को निरंतर अभिव्यक्त करती है जिसका कोई अंत ही हमें हमारे जीवन काल में कभी भी दिखाई ही नहीं पड़ता। विविधता में अंतर्निहित अभिन्नता के मूल को समझने पर हम दोनों ही स्थितियों को भले ही भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण से देखें पर फिर भी दोनों ही भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी आपस में अभिन्न स्वरूप में ही बनी रहती है।