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अम्मा की अंतिम विदाई, मौत से पहला साक्षात्कार

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गिरीश पांडेय

रात करीब 10 बजे अखबार के दफ्तर से घर लौटा। कॉलबेल की आवाज सुन पत्नी (बेबी) ने दरवाजा खोला। पत्नी के आंखों में दर्द और उदासी झलक रही थी। अम्मा के कमरे में जाकर देखा। वह बेसुध पड़ी थीं। अपने कमरे में गया। हाथ मुंह धोया। कपड़ा बदला और पिछले छह महीने की दिनचर्या के अनुसार ही पत्नी से कहा, चलो अम्मा को खाना खिला देते हैं।
 
पत्नी ने कहा आज अम्मा को रहने देते हैं। खुद खा लेते हैं। मैं नाराज होकर बोला..छोड़ो किसी को भी खाने की जरूरत नहीं। पत्नी ने कहा मेरे कहने की मंशा यह नहीं है कि अम्मा को आज नहीं खिलाना है। पिछले तीन दिनों की तुलना में उनकी हालत आज और खराब है। कुछ अच्छा नहीं लग रहा।
 
दरअसल तीन चार दिन पहले से हालत अधिक खराब होने लगी। सांस लेने में दिक्कत होनी शुरु हुई। मैंने शहर के जाने माने छाती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर वीएन अग्रवाल से अनुरोध किया कि वह एक बार घर आकर देख लें। जरूरी लगे तो अम्मा को उनके ही नर्सिंग होम में भर्ती करा दिया जाए। वह आए। देखे..और कहा गिरीश जी अब कोई लाभ नहीं। कुछ दवाएं, इंजेक्शन लिखे साथ ही यह भी कहा कि भाप देते रहिए।
 
उसी अनुसार इलाज शुरू किया गया। हम लोग पहले भी उनको भाप देते थे तब भाप देते वक्त जब वह सहने योग्य नहीं रहता तो अम्मा हाथ से हटा देतीं या उनकी कातर आंखे देखकर हम लोग खुद समझ जाते। जिस रात मैंने पत्नी पर नाराजगी दिखाई थी। उस दिन भाप देते हुए देखा कि अम्मा की ओर से न कोई विरोध था न इशारा।
 
दरअसल अम्मा जबसे बीमार पड़ी तबसे मेरी और पत्नी की एक सेट दिनचर्या थी। सुबह हम लोग गोरखपुर के लोकोग्राउंड टहलने जाते थे। वापस आकर मैं बिस्तर से अम्मा को उठाकर कंधे पर रखता था। बाथरूम में ले जाकर कमोड पर बिठाकर उनकी सारी दैनिक क्रिया कराने के बाद कुर्सी पर बिठाकर नाश्ता कराता था। फिर पत्नी द्वारा सहेजे बिस्तर पर लिटाकर हम लोग अपनी दिनचर्या पूरी करते थे। दिन करीब पौने 11 बजे मैं ऑफिस में मीटिंग के लिए चला जाता।
 
एक रिपोर्टर की दिनचर्या के अनुसार घर लौटते लौटते रात के करीब 10 बज जाते थे। लौटने के बाद अम्मा को खिलाने के लिए मैं उनको दोनों हाथों के सहारे कमर और गर्दन से उठाकर बिठाता था। पत्नी उनको खिलाती थीं।
 
उस रात पत्नी की बात मानकर हम दोनों ने पहले खुद भोजन किया, उसके बाद अम्मा के पास गए। अम्मा की बस सांसे चल रहीं थीं। उनकी कातर दृष्टि देखकर लगा कि अम्मा को शायद हमारा इंतजार था। मैंने रोज की तरह ही उनको संभालकर दोनों हाथों से उठाकर बिठाया। पत्नी ने मुंह उठाकर एक दो चम्मच दूध मुंह में डाला। कुछ भी अंदर नहीं गया। पत्नी ने फिर कोशिश की, पर अम्मा की गर्दन मेरे हाथों में लटक गई। लिटाकर देखा तो उनकी दोनों आंखों के कोर भीगे थे। अम्मा रोग, शोक और तमाम सांसारिक बंधनों से मुक्त हो चुकी थीं। साल और तारीख थी... 15 नवंबर 2015, रात के 11 बजे थे। यह मेरा मौत से पहला साक्षात्कार था।

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