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'डिनाइड बाई अल्लाह' : हलाला, मुता, खुला और तीन तलाक के खिलाफ छटपटाहट

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Muslim
-सुशांत झा
 
‘डिनाइड बाई अल्लाह’ नूर जहीर की नई किताब का नाम है जिसमें मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति, उनके कानूनी अधिकार और वास्तविकताओं पर गौर किया गया है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस किताब में मुस्लिम महिलाओं के उन मुद्दों की बात की गई है जिसे बकौल नूर जहीर ‘वे पिछले करीब बीस सालों से उठाना चाहती थी और कई बार उन्हें रुकना पड़ा और उन्होंने सवाल किया है कि वो माकूल वक्त कब आएगा जब हम इस तरह के सवालों को पूछेंगे?’
17 अप्रैल को जब इस पुस्तक का विमोचन कंस्टीट्यूशन क्लब में हो रहा था तो मंच पर पृष्ठभूमि में लगे बैनर पर लिखा था, ‘क्या इस्लाम में महिलाओं को समान दर्जा नहीं है?’ और साथ ही ये भी कि यह किताब ‘हलाला, मुता, खुला और तीन तलाक के खिलाफ एक छटपटाहट’ को व्यक्त करती है।
 
नूर जहीर ने इससे पहले भी एक किताब लिखी है- ‘माई गॉड इज वुमैन’ और शाहबानो मामले के बाद मुस्लिम समुदाय में महिलाओं की स्थिति पर काफी काम किया है।
 
इस मौके पर बोलते हुए शाहबानो केस में इस्तीफा दे चुके पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि जब उन्होंने इन मामलों की जड़ में जाने का फैसला किया और मूल कुरान को पढ़ा तो उन्हें लगा कि कट्टरपंथी मुल्लों ने इसमें काफी जोड़-घटाव किया है और इसकी अपने हिसाब से व्याख्या की है। उन्होंने कहा कि इस्माल की मूल शिक्षा कभी भी इसकी इजाजत नहीं दे सकती-जो बाद के दौर में इस्लामिक समाज में घुसपैठ कर गए। इसमें समय के साथ सुधार की जरूरत है और इस्लाम सुधार की गुंजाइश से इनकार नहीं करता।
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मुस्लिम समाज के धर्मगुरु मुफ्ती मकसूद उल हसन काजमी ने पहले के एक वक्ता के उकसावे में आकर भरसक इस्लामिक कानूनों का पक्ष लेने की कोशिश की लेकिन सबसे अच्छी बात ये हुई कि काजमी ने सुधार की गुंजाइश से इनकार नहीं किया। यहां तक कि उन्होंने कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) के बारे में भी बात आगे बढ़ाने के लिए आम सहमति की इच्छा जताई।
 
नेशलन फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमैन की जेनरल सेकरेटरी एनी राजा ने कहा कि सारे धर्म महिला अधिकारों का हनन करते हैं। और जब तक इसके प्रति वैज्ञानिक दृष्टि नहीं अपनाई जाएगी तब तक ऐसा होता रहेगा। उन्होंने जोरदार तरीके से कॉमन सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) की वकालत की और लोगों से इसका समर्थन करने को कहा। 
 
किताब की लेखिका नूर जहीर ने कहा कि शाहबानो केस के बाद मैंने अपने शोध के क्रम में यूपी-बिहार के गांवों का दौरा किया जहां पर कई लोग पत्नियों से छुटकारा पाने के लिए मौलवियों से नकली तलाकनामा बनवा लेते हैं। ऐसे में जब अदालत कहती है कि उसे उचित मुआवजा दिया जाए तो उस पर भी कट्टरपंथियों को तकलीफ है। ऐसे में सवाल उठाने का सही समय क्या है? उन्होंने पूछा कि क्या मैं अपनी जिंदगी में स्त्री-पुरुषों के बीच बराबरी देख पाऊंगी? शायद हां, या शायद नहीं!
 
इस्लाम में हलाला, मुता, खुला और तीन तलाक का प्रावधान है। इसके अलावा आरिफ मोहम्मद खान ने अरब में प्रचलित एक चौथी घिनौनी प्रथा का भी जिक्र किया जिसे मिशियार कहते हैं -यानी किसी भी तरह की जिम्मेवारी से रहित शादी। हलाला में तलाक के बाद पत्नी को किसी दूसरे पुरुष के साथ विवाह करना होता है और उसके साथ संबंध बनाने होते हैं। फिर उससे तलाक लेकर ही वो पहले पति से पुनर्विवाह कर सकती है! 
 
मुता में पैसा देकर अल्प समय के लिए किसी से संबंध बनाया जा सकता है! और खुला में यों तो महिला भी तलाक मांग सकती है लेकिन मुआवजे के बारे में स्पष्ट प्रावधान नहीं है। मुआवाजा जब पुरुषों के द्वारा दिए तलाक में नहीं दिया जा सकता था- तो खुला में तो शायद इसकी कल्पना नहीं हो सकती। शाहबानो केस में यही हुआ था- जब अदालत ने एक खास मुआवजे की बात की तो कट्टरपंथी भड़क उठे। तीन तलाक का हाल ये है कि इसका दुरुपयोग ज्यादा है-आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि कई जगह महिलाएं जब कहीं बाजार से या ऑफिस से घर आती हैं तो दरवाजे पर तलाक के कागज चिपके होते हैं। हद तो ये है कि फोन, मेल और एसएमएस से तलाक दिए जा रहे हैं। हालांकि कई इस्लामिक देशों में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है।
 
एक मुसलमान से आर्यसमाजी बन गए महेंद्रपाल आर्य ने कुछ ऐसी बातें की जिसमें थोड़ा हंगामा भी हुआ। आर्य ने कहा कि तलाक के विचित्र नियम हैं। कोई पुरुष कहे कि-तेरा खाना मेरे लिए हराम है, मेरे बच्चे को हाथ न लगाना, तेरा फलाना अंग मेरे लिए मां के समान है-तो इसे तलाक की कोटि में मान लिया जाएगा! महिलाओं को जमात में, इमामत में कहीं कोई अधिकार नहीं और संपत्ति में सीमित अधिकार। ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि महिलाओं को बराबरी हासिल है?
 
हालांकि इस पर हंगामा हुआ और मुफ्ती मकसूद उल हसन काजमी ने कहा कि आर्य साब कुरान की आयतों को गलत तरीके से उद्धृत कर रहे हैं, लेकिन मुफ्ती ने ये बात मानी कि वे लोग भी तीन तलाक को हटाने के लिए काम कर रहे हैं और हलाला को वे ‘लानत’ मानते हैं और इससे छुटकारे की जरूरत है।
 
हालांकि गजब का विरोधाभास दिखाते हुए मुफ्ती ने बुक लांच के समय किताब को छूने और साथ खड़ा होने से इनकार कर दिया-क्योंकि किताब में उनके हिसाब से आपत्तिजनक बातें थीं!
 
इस किताब का विमोचन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर कराने की योजना थी लेकिन कई नामचीन इस्लामिक विद्वान और महिला-अधिकारवादियों ने इसमें पता नहीं किस भय से इसमें आने से इनकार कर दिया, जो यों तो टीवी बहसों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहते हैं।
 
किताब का अभी विमोचन ही हुआ है और इसकी समीक्षा बाद में की जाएगी, लेकिन विमोचन कार्यक्रम से एक बात तो साफ हुई कि इस किताब ने समाजिक जकड़नों पर एक दस्तक जरूर दी है, एक नया विमर्श जरूर खड़ा किया है। इस किताब को सिर्फ मुस्लिम महिलाओं पर केंद्रित मानना जल्दबाजी होगी क्योंकि मुस्लिम समाज देश का एक अहम समाज है और वहां के बदलाव पूरे देश के बदलाव को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं। क्योंकि बकौल लेखिका नूर जहीर, ‘मैं साफ कर दूं कि मैं वामपंथी हूं और मातृसत्तात्मक व्यवस्था बनाना मेरा इरादा नहीं। मैं सिर्फ बराबरी चाहती हूं। और मुझे मालूम है कि यह आयोजन दक्षिणपंथी लोग कर रहे हैं-लेकिन मुझे अपनी बात करने का जो भी मंच मिलेगा वहां मैं अपनी बात कहती रहूंगी।’ ‘डिनाइड बाई अल्लाह’ का प्रकाशन ‘वितस्ता पब्लिशिंग लि. ने किया है।

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