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संक्रांति पर पतंग काटें, अंगुलियां नहीं

Webdunia
डॉ. अपूर्व पौराणिक 
पतंग दुनिया के बहुत से देशों में उड़ाई जाती है, परंतु लड़ाका पतंग (फाइटर काइट्स) केवल भारत और भारतीय उपमहाद्वीप के पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में लोकप्रिय है। दो पतंगों के पेंच की लड़ाई में दूसरी पतंग की डोर को काटकर गिराने के खेल का आनंद और रोमांच उसमें भाग लेने वाले ही महसूस कर सकते हैं। अजीब-सा जुनून है यह।
 
पेंच की लड़ाई में कई हुनर होते हैं। पतंग का संतुलित होना, पतंगबाज का अनुभवी होना, दूसरे की डोर काटने के लिए खुद की पतंग को खूब तेजी से अपनी ओर खींचते जाना या बहुत तेजी से ढील देते जाना और साथ में झटका या उचके देना। डोर को फुर्ती से लपेटने वाले तथा जरूरत पड़ने पर निर्बाध रूप से छोड़ते जाने वाले असिस्टेंट की भूमिका भी खास बन पड़ती है। जैसे ही एक डोर कटती है, उसे थामने वाले हाथों को मालूम पड़ जाता है, तनाव की जगह ढीलापन। उसकी कटी पतंग निस्सहाय-सी जमीन की दिशा में डूबने लगती है। चेहरा उतर जाता है। जीतने वाले समूह की ऊंची आवाज आकाश गूंजा देती हैं, 'वह काटा- वह काटा!'  
 
इस लड़ाई में धागे/डोर का बहुत महत्व है। सूत का यह धागा न केवल मजबूत होना चाहिए, बल्कि उसकी सतह के खुरदरेपन से दूसरे धागे को काटने की पैनी क्षमता होना चाहिए। इस खास धागे को मांजा कहते हैं। इसे बनाने का तरीका मेहनत भरा और खतरनाक है। एक खास किस्म की लोई तैयार करते हैं, जिसमें चावल का आटा, आलू, सरेस, पिसा हुआ बारीक कांच का बुरादा और रंग मिला रहता है। इसे हाथों में रखकर, दो खंभों के बीच बांधे गए सूत के सफेद धागों पर उक्त लोई की अनेक परतें चढ़ाई जाती हैं। 
 
अहमदाबाद में उत्तरायन के कुछ सप्ताह पूर्व से सड़क किनारे, फुटपाथों पर ऐसे सफेद और रंगीन धागों की अनेक पंक्तियां देखी जा सकती हैं। 
 
उत्तरप्रदेश व बिहार से अनेक गरीब श्रमिक इसमें जुते रहते हैं। उनके हाथ व अंगुलियां कांच लगे कंटीले, खुरदरे मांजे को लीपते-पोतते, सहेजते, लपेटते, जगह-जगह से कट जाते हैं, छिल जाते हैं, बिंध जाते हैं, लहूलुहान हो जाते हैं। वे हाथ पर पट्टियां बांधते हैं और फिर धागे लपेटते हैं। उनके चेहरे से पीड़ा टपकती है, फिर भी मजबूरीवश काम किए जाते हैं। पारिश्रमिक कम ही मिलता है। पूरा परिवार वहीं सड़क किनारे दिन गुजारता है। 
 
पिछले कुछ वर्षों से कुछ शहरों में पतंगबाजी के खेल में मांजे के उपयोग को बंद करने की मुहिम शुरू हुई है, परंतु उसका असर अभी क्षीण है। यह आवाज इसलिए उठी है कि आसानी से न दिखाई पड़ने वाले मांजे की चपेट में अनेक राहगीर व आकाश में विचरते पक्षी आ जाते हैं। निःसंदेह यह अपने आप में एक पर्याप्त कारण है, परंतु इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है उन गरीब श्रमिकों के घावों की पीड़ा और व्यथा, जो लोगों को चंद घंटों के जुनून और वहशी खुशी को पोसने के लिए भला क्यों सही जाना चाहिए? दुनिया के दूसरे दशों में पतंगबाजी का आनंद एक शांत, कलात्मक, सुंदर हुनर के रूप में उठाया जाता है। वही क्यों न हो? और फिर पेंच की लड़ाई सादे धागे से भी तो हो सकती है। उसमें ज्यादा कौशल लगेगा और अधिक देर मजा आएगा।

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