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कृष्ण की गीता तो पढ़ी होगी लेकिन अब पढ़िए महाभारत की पराशर गीता

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parasar geeta
ऋग्वेद के मंत्रदृष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक सप्त ऋषियों में से एक महर्षि वशिष्ठ के पौत्र महान वेदज्ञ, ज्योतिषाचार्य, स्मृतिकार एवं ब्रह्मज्ञानी ऋषि पराशर के पिता का नाम शक्तिमुनि और माता का नाम अद्यश्यंती था। ऋषि पराशर ने निषादाज की कन्या सत्यवती के साथ उसकी कुंआरी अवस्था में समागम किया था जिसके चलते 'महाभारत' के लेखक वेदव्यास का जन्म हुआ। सत्यवती ने बाद में राजा शांतनु से विवाह किया था। पराशर बाष्कल और याज्ञवल्क्य के शिष्य थे। महाभारत में पराशर गीता का उल्लेख मिलता है जानिए उसी के बारे में।
 
 
पारीक समाज के आदि पुरुष, वंश प्रवर्तक ऋषि पराशर ने कई विद्याओं का ज्ञान प्राप्त कर उसे दुनिया को प्रदान किया था। ऋग्वेद में पराशर की कई ऋचाएं हैं। विष्णु पुराण, पराशर स्मृति, विदेहराज जनक को उपदिष्ट गीता (पराशर गीता), बृहत्पराशरसंहिता आदि पराशर की रचनाएं हैं। पराशर ऋषि ने अनेक ग्रंथों की रचना की जिसमें से ज्योतिष के ऊपर लिखे गए उनके ग्रंथ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। प्राचीन और वर्तमान का ज्योतिष शास्त्र पराशर द्वारा बताए गए नियमों पर ही आधारित है। ऋषि पराशर ने ही बृहत्पाराशर होरा शास्त्र, लघुपराशरी (ज्योतिष) लिखा है।
 
 
पराशर की अन्य रचनाएं : बृहत्पाराशरीय धर्मसंहिता, पराशरीय धर्मसंहिता (स्मृति), पराशर संहिता (वैद्यक), पराशरीय पुराणम्‌ (माधवाचार्य ने उल्लेख किया है), पराशरौदितं नीतिशास्त्रम्‌ (चाणक्य ने उल्लेख किया है), पराशरोदितं, वास्तुशास्त्रम्‌ (विश्वकर्मा ने उल्लेख किया है) आदि उन्हीं की रचनाएं हैं। पराशर स्मृति एक धर्मसंहिता है जिसमें युगानुरूप धर्मनिष्ठा पर बल दिया गया है।
 
ऋषि पराशरजी एक दिव्‍य और अलौकिक शक्ति से संपन्न ऋषि थे। उन्‍होंने धर्मशास्‍त्र, ज्‍योतिष, वास्‍तुकला, आयुर्वेद, नीतिशास्‍त्र, विषयक ज्ञान को प्रकट किया। उनके द्वारा रचित ग्रं‍थ वृहत्‍पराशर होराशास्‍त्र, लघुपराशरी, वृहत्‍पराशरीय धर्म संहिता, पराशर धर्म संहिता, पराशरोदितम, वास्‍तुशास्‍त्रम, पराशर संहिता (आयुर्वेद), पराशर महापुराण, पराशर नीतिशास्‍त्र, आदि मानव मात्र के लिए कल्‍याणार्थ रचित ग्रं‍थ जगप्रसिद्ध हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
 
 
पराशर गीता : महाभारत के शंति पर्व में भीष्म और युधिष्ठिर के संवाद में युधिष्ठिर को भीष्म राजा जनक और पराशर के बीच हुए वार्तालाप को प्रकट करते हैं। इस वर्तालाप को पराशर गीता नाम से जाना जाता है। इसमें धर्म-कर्म संबंधी ज्ञान की बाते हैं। दरअसल, शांति पर्व में सभी तरह के दर्शन और धर्म विषयक प्रश्नों के उत्तर का विस्तृत वर्णन मिलता है।
 
 
पाराशर गीता में कुल नौ अध्‍याय हैं। कुछ प्रमुख बातें...
पराशर गीता के अध्याय 5 और श्लोक 29 में कल्‍याण प्राप्ति के हेतु धर्म के संबंध में कहा गया है कि मनुष्‍यों में जैसे धर्म और अधर्म निवास करते हैं उस प्रकार मनुष्‍य से इतर अन्‍य प्राणियों में नहीं।
 
अर्थात : धर्म और अधर्म मनुष्‍य योनि का गुण है और यह गुण केवल मनुष्‍यों में ही पाया जाता है। इस गुण के कारण वह अन्‍य प्राणियों से भिन्‍न श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रकार मनुष्‍य मात्र को धर्मयुक्‍त आचरण ही करना चाहिए।
 
 
धर्म एस कृत: श्रेयनिह लोके परत्र च। 
सस्‍माङ्ग परमं नास्ति यथा प्रादुर्मनीषिण:।। (पा. गीता 1/6)
अर्थात : धर्म को परम शुभ और शीघ्र फलदायी बताते हुए भगवान पराशर ने बताया है कि धर्म का ही विधि पूर्वक अनुष्‍ठान किया जाए तो वह इहलोक और परलोक में परम कल्‍याणकारी होता है। इससे बढ़कर दूसरा कोई श्रेय का उत्तम साधन नहीं है।
 
 
यथा नदीनदा: सर्वेसागरे यान्ति संस्यितिम्। 
एवमाश्रमिण: सर्वे गृहस्‍थे यान्ति संस्थितिम्।। (पा. गीता 6/39)
अर्थात : चतुष्टाश्रमों में से गृहस्‍थाश्रम की सभी धर्मग्रंथों ने मुक्‍त कंठ से प्रशंसा की है। महर्षि पराशर ने भी गृहस्‍थाश्रम की अधिकाधिक प्रशंसा की है। उनके अनुसार जिस प्रकार सभी नदी-नद सागर में जाकर मिलते हैं, उसी प्रकार समस्‍त आश्रम गृहस्‍थ का ही सहारा लेते हैं।
 
 
देवतातिथिभृत्‍येभ्‍य: पितृभ्‍यश्‍चात्‍मनस्‍तथा। 
ऋणवान् जायते मर्त्‍यस्‍तस्‍मादनृणतां व्रजेत।।(पा. गीता 3/9)
अर्थात : गृहस्‍थाश्रम के अंतर्गत व्‍यक्ति कई ऋणों से मुक्ति प्राप्‍त करता है। भगवान पराशर के अनुसार प्रत्‍येक मनुष्‍य देवता, अतिथी, भरण-पोषण योग्‍य कुटुम्‍बीजन, पितर तथा अपने-आप का ऋणी होकर जन्‍म लेता है।
 
 
इयं ही योनि: प्रथमा यां प्राण्‍य जगतीपते। 
आत्‍मा वै शक्‍यते त्रातुं कर्मभि: शुभलक्षणै:।। (पा. गीता 8/32)
अर्थात : पाराशर गीता मनुष्‍य को कर्मशील रहते हुए सत्‍कर्म करने की प्रेरणा देती है। इसके अनुसार मनुष्‍य की योनि ही वह अद्वितीय योनि है जिसे पाकर शुभ कर्मों के अनुष्‍ठान से आत्‍मा का उद्वार किया जा सकता है। अर्थात मोक्ष की प्राप्‍ति की जा सकती है। चुंकि कृत, कर्म का फल प्राणी को अवश्‍य ही भोगना पड़ता हे- "जन्‍तु स्‍वकर्मफलमरनुते" (पा. गीता 9/39)। 

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