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उर्दू शायरी में हिन्दी की चमक

Webdunia
दीपक असीम 
 
हिन्दी से जो लोग उर्दू मंचों पर आ रहे हैं, उनकी शायरी में एक अलग ही ताज़गी और अलग ही चमक है। 
 
राजवाड़ा के मुशायरे में अगर शाजापुर के पंकज पलाश ने सबको प्रभावित किया था, तो सनावद उर्स के मुशायरे में खरगोन के गोविंद गीते की शायरी सबसे अलग, सबसे जुदा रही। फॉर्म ग़ज़ल का था, मगर हिन्दी कविता की कई खूबियां उसमें थीं- नई भाषा, बदलते रिश्तों की सही पहचान और अध्यात्म भी- ये पर्वत पेड़, सूरज, चांद-तारे/ उसी की साधना में लीन हैं सब...। न्यूक्लियर फैमिली के दौर में लड़कियां ही मां-बाप का ज्यादा खयाल रख रही हैं और इसे गोविंद गीते ने उकेरा- निकाला घर से जब बेटों ने तो मां-बाप ये बोले/ कहां जाते बुढ़ापे में अगर बेटी नहीं होती...। तसव्वुफ के बहुत सारे शेर उन्होंने एकदम नए अंदाज़ में सुनाए। सनावद में गुजरात शाह वली के उर्स की शुरुआत मुशायरे से हुई। बाद की रातों में तकरीरें, कव्वालियां...। 
 
खरगोन के ही सिफर खरगोनवी हास्य-व्यंग्य की शायरी करते हैं। उन्होंने एक नया प्रयोग इसमें किया है। उनकी शायरी में एक सलमा नाम की लड़की का बारंबार जिक्र है। मजाज लखनवी ने पहली बार किसी खातून का नाम अपनी नज़्मों में लिया था। उस खातून का नाम भी सलमा ही था। उस्तादों ने इस पर बहुत नाक भौं-सिकोड़ी थी, मगर उन्होंने सलमा का दामन नहीं छोड़ा था। बहरहाल वे इतना जल्दी-जल्दी पढ़ रहे थे कि उनका कलाम जब तक नोट करो तब तक तो सलमा का जिक्र आ जाता था और जनता में हंसी की लहर दौड़ जाती थी। वे कामयाब रहे। 
 
कामयाबी के पैमाने पर देखा जाए तो सबसे ज्यादा कामयाब रहे मुंबई के इमरान रिफअत। वजह नई शायरी, नए ढंग की शायरी- पतंग उड़ा के खुली रील छोड़ देता है/ खुदा खफा हो तो फिर ढील छोड़ देता है... मैंने जब देखा कि सिग्नल हो गया/ मौत से खुद कह दिया चल हो गया...। 
 
उज्जैन की लड़की शबनम अली शबनम के शेर में थी उड़ने की चाहत- वो परिंदे जो कैद हैं मुझमें/ उनको आजाद करके देखती हूं...। नईम फराज़ की आवाज़ बहुत अच्छी है, मगर बस आवाज़। शऊर आशना के बारे में तो यह भी नहीं कहा जा सकता। ना कलाम में खम और ना तरन्नुम में दम। वे बस एक हाजरी थे। कयामुद्दीन कयाम ने अलबत्ता अच्छे शेर पढ़े- जो आंखों में छुपा है दर्द वो पलकें समझती हैं/ जनाज़े का है कितना बोझ ये कांधा समझता है। 
 
नूरी अजीज कवि सम्मेलनों जैसी कविता शायरी के मंच पर करना चाह रही थीं। की भी। मगर बात बनी नहीं। मरहूम नूर इंदौरी के बेटे सरफराज नूर (जी हां तखल्लुस भी अब्बा वाला रख लिया है) जब अपने वालिद के तरन्नुम को दोहराने की कोशिश करते हैं, तो बड़े ही दयनीय लगते हैं। उनकी आवाज़ में वो रेंज है ही नहीं। नूर साहब आखिरी दिनों में जैसा तरन्नुम पेश करते थे, उससे भी कई दर्जा कमजोर तरन्नुम सरफराज का है। तिस पर तुर्रा यह कि शेर बहुत ही आउटडेटेड...। सत्तर साल पहले जैसी शायरी होती थी वैसी शायरी (कलीम अल्ला, कलाम अल्ला)। जैक-जरियों से मुशायरों में घुसना और लोगों का (अपना भी) वक्त बर्बाद करने का क्या मतलब है? 
 
अख्तर ग्वालियरी पिचहत्तर साल से ऊपर के हो गए हैं। शरीर भी मजबूत नहीं रहा है। मगर आवाज़ में खनक वैसी ही है। उस पर कलाम की पुख्तगी- दिल से तेरा खयाल निकलने नहीं दिया/ हमने इस आफताब को ढलने नहीं दिया। एक और गजल उनकी बढ़िया रही- अंधे कुएं में फेंक दिया ख्वाहिशात को/ तब जाके कहीं सुकून मिला है हयात को...। 
 
नईम अख्तर खादमी की आवाज़ में वो लपक अब बाकी नहीं रही। महीने में बीस दिन मुशायरे पढ़ने से जो थकावट जहन में आती है, वो हर जगह असर डालती है। बहरहाल आखरी में लोग भी ज्यादा नहीं बचे थे। उन्होंने पढ़ा- कभी गिरते तो कभी गिर के संभलते रहते/ बैठे रहने से तो बेहतर था कि चलते रहते... दूसरी गज़ल का ये मक्ता दिल को छूने वाला था- बड़ी उदास हुई जा रही है घर की फजा/ चलो नईम जरा मुस्कुरा लिया जाए। 
 
निजामत जबलपुर के मन्नान फराज की थी। नाजिम अच्छे शेर याद करके सुनाते हैं। मगर मन्नान के हाफजे में पता नहीं कैसे बुरे और मामूली शेर दर्ज होते चले जाते हैं। उनकी निजामत बहुत ही कमजोर रही। शहजाद अनवर, वाहिद अंसारी, मुश्ताक अंसारी, जिया राना, नूह आलम, हामिद भुसावली, शरीफ सरल आदि ने भी कलाम पढ़ा इसीलिए तो मुशायरा सुबह पांच बजे तक चला। 
 
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