Publish Date: Friday, 30 January 2026 (17:42 IST)
Updated Date: Friday, 30 January 2026 (01:44 IST)
ना बिजली, ना मोबाइल और न ही कोई गाड़ी। ऊपर से -45 से -28 डिग्री की कड़कड़ाती ठंड। साइबेरिया के खानाबदोश चरवाहे इन मुश्किलों में भी आराम से जीते हैं। देखिए उनकी जिंदगी।
दुर्लभ इंसान
मंगोलिया से सटा तोआ रूस का स्वायत्त प्रदेश है। साइबेरिया के इस इलाके में सर्दियों में बाहरी इंसान ना के बराबर दिखते हैं। बर्फीले तूफानों के बीच तोआ में सिर्फ चरवाहे ही दिखते हैं।
पीढ़ियों से पशुपालन
तांजोरूम दारियुस का परिवार पीढ़ियों से भेड़ और याक पालते आए हैं। चरवाहों की ज्यादातर जरूरतें भेड़, याक और जंगली ऊंट से ही पूरी हो जाती हैं।
8 महीने बर्फ में
माइनस 45 या माइनस 30 डिग्री की सर्दी में कोई बाहरी वायरस जिंदा नहीं बचता। लेकिन इसके बावजूद चरवाहें हर दिन अपनी भेड़ों को घुमाते हैं। इससे भेड़ें भी स्वस्थ रहती हैं।
बाहरी दुनिया से अलग थलग
साइबेरिया में मिलने वाली भेड़ें और बकरियां खुद को बेहद सर्द माहौल के हिसाब से ढाल चुकी हैं। इनके शरीर पर बेहद मोटा फर होता है। कभी कभार तो इस इलाके में तापमान -70 डिग्री तक चला जाता है।
ऊन के कारोबारी
इतिहासकारों के मुताबिक इन चरवाहों के पुरखे सैकड़ों साल पहले तुर्की मध्य एशिया आए। इन्हें युर्ता कहा जाता है। तब से ये लोग अस्थायी घरों में रहते हैं। गर्मियों में भेड़ों को चराते हुए वह शहरों की ओर जाते हैं और ऊन बेचते हैं। इसे दुनिया का सबसे महंगा ऊन कहा जाता है।
नया दिन, नई जगह
भेड़ों के साथ आगे बढ़ता युर्ता कबीला दोपहर बाद टेंट लगाता है और एक रात वहीं आराम करने के बाद आगे बढ़ता है। इस दौरान सबसे बड़ी चिंता भेड़ियों की रहती है। भेड़िये अक्सर भेड़ों पर हमला करने की फिराक में रहते हैं।
हमेशा यात्रा में
ये खानाबदोश चरवाहे लंबी दूरी की यात्राएं करने के लिए मशहूर हैं। मध्य एशिया और दक्षिण अमेरिका के बर्फीले इलाके में ऊंट की एक खास किस्म पाई जाती है। चरवाहे स्लेज के लिए इस ऊंट का इस्तेमाल करते हैं।
गोलियों की गूंज
अंधाधुंध शिकार के चलते बर्फ में रहने वाले जंगली ऊंटों की संख्या काफी घट चुकी है। इनके शिकार का असर पर्यावरण और चरवाहों पर भी पड़ा है।