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जलवायु न्याय की मांग कर रहा है आपदा प्रभावित नेपाल

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नेपाल में पिछले हफ्ते आई विनाशकारी बाढ़ के चलते 1,200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 4,000 से अधिक लोग लापता हैं। नेपाल के लोग इस आपदा से दुखी होने के साथ-साथ नाराज भी हैं। 

नेपाल के एक जलवायु कार्यकर्ता और राजनेता ताशी ल्हाजोम ने न्यूज एजेंसी एएफपी से कहा कि नेपाल ने ऐसा क्या किया है, जिसकी वजह से ऐसा हुआ। उन्होंने कहा, "नेपाल जलवायु के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है लेकिन साथ ही ये सबसे क्लाइमेट-फ्रेंडली देश भी है।"  ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा
 
26 अगस्त को एक ग्लेशियर के टूटने की वजह से चीन-नेपाल सीमा पर बाढ़ आई थी। ग्लेशियर के टूटने की स्पष्ट वजह अभी पता नहीं चली है लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते दुनियाभर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और ऐसी आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। तीन करोड़ लोगों की आबादी वाले नेपाल का ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है लेकिन उसे आपदाओं के रूप में इसका नुकसान झेलना पड़ता है। ल्हाजोम कहते हैं, "हम एक ऐसे अपराध की सजा भुगत रहे हैं, जो हमने किया ही नहीं है।"
 
नेपाल के ग्लेशियर वैज्ञानिक तेनजिंग चोग्याल ने कहा कि वैश्विक उत्सर्जन को बढ़ाने वाले अमीर औद्योगिक देशों को अपनी भूमिका स्वीकार करनी चाहिए और इसकी कुछ जिम्मेदारी लेनी चाहिए। काठमांडू स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) के आपदा विशेषज्ञ शाश्वत सान्याल ने कहा कि यह क्षेत्र दुनिया की किसी और जगह की की तुलना में लगभग "दोगुनी दर" से गर्म हो रहा है। ALSO READ: नेपाल: विनाशकारी बाढ़ से उबरने के लिए 4-5 अरब डॉलर की दरकार
 
नेपाल के नेताओं का कहना है कि तेजी से बदलते पर्वतीय वातावरण के हिसाब से खुद को ढालने के लिए नेपाल को दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय मदद की जरूरत है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा है कि नेपाल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए कि उसके द्वारा झेली गईं आपदाएं जलवायु परिवर्तन का नतीजा हैं। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने इसे एक चेतावनी संकेत बताया है और इसे "जलवायु न्याय" की मांग उठाई है। 

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