Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 (08:10 IST)
Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 (08:37 IST)
आज जिस पर्यावरण में हम सांस लेते हैं वह हमेशा से ऐसी नहीं थी। साइंस जर्नल ने बीते हफ्ते पृथ्वी के वायुमंडल में ऑक्सीजन की उत्पत्ति के बारे में एक रिसर्च रिपोर्ट छापी है। इस रिपोर्ट से पृथ्वी पर ऑक्सीजन की उत्पत्ति के बारे में कुछ नई बातें पता चली हैं। इन्हें पहले मिली जानकारियों से जोड़ कर ऑक्सीजन की उत्पत्ति और विस्तार की इस पहेली को सुलझाने की कोशिश की जा रही है।
जीओई की अवधारणा
पृथ्वी की आयु लगभग 4.55 अरब वर्ष आंकी गई है। अब तक यह लगभग साफ हो चुका है कि पृथ्वी के वायुमंडल या उसके महासागरों में शुरुआती 2 अरब साल तक मुक्त रूप से ऑक्सीजन नहीं थी। इसकी आधी उम्र में यानी लगभग 2.45 अरब साल पहले फोटोसिंथेटिक सायनोबैक्टीरिया के पूर्वजों ने धरती को ऑक्सीजन से भरना शुरू किया।
इस घटना को ग्रेट ऑक्सीडेशन इवेंट (जीओई) कहा जाता है। जीओई पृथ्वी पर सिर्फ ऑक्सीजन के बढ़ने की घटना नहीं है। इसने पृथ्वी के रसायन, महासागर और जीवन की दिशा ही बदल दी। ऑक्सीजन के बढ़ने के साथ ही पृथ्वी पर ऐसी परिस्थितियों का निर्माण हुआ जिसमें जटिल बहुकोशिकीय जीवों के बनने और फलने-फूलने की प्रक्रिया शुरू हुई।
साइंस जर्नल की रिपोर्ट में यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट के जियोकेमिस्ट मोजतबा फाखरी का कहना है कि जीओई, "पृथ्वी के इतिहास में उसकी सतह के काम करने के तरीके में आया सबसे दिलचस्प और बड़ा बदलाव है।" हालांकि जीओई की इस कहानी पर बीते कुछ समय से संदेह उभरने शुरू हुए।
ऑक्सीजन बनाने वाले जीव पहले आए, ऑक्सीजन बाद में बढ़ी
खनिजों के विश्लेषण से ऐसे संकेत मिले हैं कि ऑक्सीजन पैदा करने वाले बैक्टीरिया की उत्पत्ति जीओई से करोड़ों साल पहले हो गई थी। इसके बावजूद इस समय में ऑक्सीजन का स्तर नीचे था। ऐसे में बैक्टीरिया की उत्पत्ति और ऑक्सीजन बनने के बीच एक समय का फासला दिखने लगा जिसे समझना मुश्किल था।
पिछले साल नेचर जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि ऑक्सीजन बनाने वाले सायनोबैक्टीरिया ने 2.85 अरब साल पहले कार्बोनेट बनाया था। आधुनिक सूक्ष्मजीवों के म्यूटेशन की दर का इस्तेमाल करने पर फोटोसिंथेसिस की उत्पत्ति थोड़ा और पीछे जा कर 3.5 अरब साल पहले तक पहुंच गई।
दो दशक तक रिसर्चर यह पता लगाने की कोशिश करते रहे कि जीओई से पहले ऑक्सीजन की जो झलक दिखी वह कहां से आई थी। ऑक्सीजन की यह झलक उन्हें उन खनिजों से मिली थी जो बिना ऑक्सीजन के नहीं बन सकते। इससे एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि जब ऑक्सीजन बनाने वाले जीव धरती पर आ गए थे तो फिर उसके बाद ऑक्सीजन बढ़ने में करोड़ों साल क्यों लगे।
ऑक्सीजन बनती थी और खत्म हो जाती थी
हालांकि पृथ्वी पर फोटोसिंथेटिक विस्फोट और जीओई के बीच जो समय का फासला है उसे वास्तविक मानते हुए कुछ वैज्ञानिकों ने इसकी व्याख्या की है कि समंदर में तैरते लोहे जैसे मटीरियल के साथ हुई प्रतिक्रियाओं ने शुरुआती ऑक्सीजन को निगल लिया।
ऑस्ट्रेलिया और दूसरी जगहों पर जो ऑक्सीडाइज्ड लोहे से बनी गहरे लाल रंग की आकृतियां मिली हैं वह इसी ऑक्सीजन के जमा होने से बनी थीं।
बाद में वैज्ञानिकों ने सुझाया कि पृथ्वी की गहराई से निकले अपचायक रसायनों का निरंतर बहाव ऑक्सीजन को निगलते रहे। अपचायक रसायन ऑक्सीजन निगलने वाले रसायनों को कहा जाता है। अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि दसियों करोड़ साल तक इस तरह का ऑक्सीजन निगलने वाला रासायनिक स्पंज कैसे काम करता रहा।
उथले समुद्र बने ऑक्सीजन बढ़ाने का जरिया
भूरसायन के वार्षिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, गोल्डश्मिट कांफ्रेंस में इस महीने एक चर्चा से यह बात उभरी कि ऑक्सीजन तब तक नहीं बढ़ सकती थी जब तक कि दुनिया के महासागरों में छिछले इलाकों का निर्माण नहीं हो गया।
फाखरी और उनके सह-लेखकों ने गोल्डश्मिट में जो नई व्याख्या पेश की है उसके मुताबिक महासागरों के छिछले इलाके पृथ्वी पर फोटोसिंथेटिक ऑक्सीजन के प्रमुख केंद्र रहे हैं। हालांकि यह कुल समुद्री क्षेत्र का महज 9 फीसदी ही हैं। जब समुद्री सायनोबैक्टीरिया की इन जगहों पर मौत होती थी तो उनका कार्बन बहुत जल्द तलछट में दफन हो जाता था। इस तरह से इनका ऑक्सीडाइज होना और वातावरण में ऑक्सीजन का जाना रुक जाता था।
जीओई के समय इन इलाकों का विस्तार हुआ क्योंकि नए जो महाद्वीप बने थे उनका टूटना शुरू हो गया था। एक मॉडल दिखाता है कि इस क्षेत्र का विस्तार एक समय कुल क्षेत्र के 10 फीसदी से ज्यादा तक हो गया था। ऐसे में ऑक्सीजन के वातावरण में जमा होने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला। फाखरी ने कहा, "यह इस विचार को भी मजबूती देता है कि टेक्टोनिक गतिविधियों ने बड़े पैमाने पर बदलावों को जन्म दिया होगा।"
हालांकि यह परिवर्तन बहुत मजबूत नहीं था। इस दशक की शुरुआत में भूरसायनशास्त्रियों की एक टीम ने बताया कि दक्षिण अफ्रीका के समुद्री तलछटों में कम ऑक्सीजन के सल्फर सबूत जीओई की शुरुआत के बाद 20 करोड़ साल की अवधि में कई बार आए। उनमें तीन ऐसे दौर भी शामिल हैं जब पृथ्वी बर्फ का गोला बन गई थी।
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ऑक्सीजन की उत्पत्ति में हिमयुगों की भूमिका
गोल्डश्मिट कांफ्रेंस में एक दलील यह भी दी गई कि ऑक्सीजन की लहरें समय समय पर प्राचीन पृथ्वी के बर्फ के गोले में बदलने को भी दिखाती हैं। बर्फ का गोला पृथ्वी का वह दौर है जिसमें बर्फ पृथ्वी के भूमध्यरेखा तक के इलाके तक जम जाती थी।
कई दशकों से वैज्ञानिक चट्टानों के रिकॉर्ड में तीन सल्फर आइसोटोप का अनुपात बदलना जीओई का एक नाटकीय बदलाव मानते आए हैं। यह घटना वायुमंडल में पराबैंगनी किरणों के कारण सल्फर डाइऑक्साइड के टूटने को दिखाती है। ऑक्सीजन बढ़ने के बाद जब ओजोन की परतें बनीं और उन्होंने पराबैंगनी किरणों को रोक दिया तो ये प्रतिक्रियाएं धीमी पड़ गईं। आइसोटोप में यह बदलाव बताता है कि जीओई 2।45 अरब साल पहले हुई थी। वैज्ञानिक इस तारीख को लेकर मोटे तौर पर सहमत हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चाहे जो भी कारण हो पूरी दुनिया में ग्लेशियरों के बनने की वजह से सागर और ज्यादा कार्बन -डाइऑक्साइड नहीं सोख सके। इसकी वजह से धरती फिर से गर्म होने लगी और बर्फ पिघलती गई। इसके पिघलने में करीब 10,000 साल लगे होंगे जबकि कार्बन डाइऑक्साइड 100,000 वर्ष से ज्यादा समय से वायुमंडल में जमा होती रही। जलवायु के गर्म होने की प्रक्रिया में बहुत सारा फॉस्फोरस महाद्वीपों से टूट कर सागरों में जा मिला। इसकी वजह से समुद्री सूक्ष्म जीवों की भरमार हो गई और ऑक्सीजन बढ़ी। ओजोन परत बनने से पराबैंगनी किरणों के जरिए ऑक्सीजन का टूटना रुका।
इसके बाद जब अगली बार पृथ्वी बर्फ का गोला बनी तो उसने सागर में माइक्रोबायल प्रोडक्शन को बंद कर दिया होगा और ऑक्सीजन फिर घट गया होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी पर ऑक्सीजन के बढ़ने और घटने की प्रक्रिया तब तक चलती रही जब तक कि यह हिमयुगों के चक्र से बाहर नहीं निकल गई।
कई चरणों में हुआ जीओई
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के भूरसायनशास्त्री आंद्रे बेकर का कहना है, "हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जीओई एक बार में हुआ बदलाव नहीं बल्कि रुक-रुक कर कई चरणों में हुई परिवर्तन प्रक्रिया थी।"
आंद्रे बेकर 2021 में नेचर पत्रिका में छपी रिपोर्ट के सह-लेखक हैं। दक्षिण अफ्रीका और दूसरी जगहों से मिले भूरासायनिक सबूत बताते हैं कि ऑक्सीजन का बढ़ना और घटना तकरीबन 20 करोड़ वर्षों तक चला। यानी ऑक्सीडेशन की एक बड़ी घटना के बाद डिऑक्सीडेशन की बड़ी घटना हुई और यह क्रम चलता रहा। ऑक्सीडेशन और डिऑक्सिडेशन रासायनिक प्रक्रियाएं हैं लेकिन यहां वैज्ञानिक वायुमंडल में ऑक्सीजन बढ़ने और घटने की बात कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों में मतभेद
मिशिगन यूनिवर्सिटी के जियोकेमिस्ट जेना जॉनसन का कहना कि सारे वैज्ञानिक इस बात से सहमत नहीं हैं कि फोटोसिंथेटिक ऑक्सीजन का उत्पादन इतना पहले शुरू था। जॉनसन का कहना है कि सूक्ष्मजीवों ने सबसे पहले एक ऐसी प्रक्रिया विकसित की थी जिसमें ऑक्सीजन नहीं निकलती थी।
कुछ मेटल ऑक्साइड जिन्हें पहले बायोलॉजिकल ऑक्सीजन का प्रमाण माना जाता था उसे पराबैंगनी किरणों के कारण हुई फोटोकेमिकल रिएक्शन से निकला माना जाता है। साइंस जर्नल में छपी रिपोर्ट में जॉनसन का कहना है कि इन्हें समझने के लिए अभी और काम करना होगा।
(यह आलेख साइंस जर्नल में छपे रिपोर्ट को आधार बना कर लिखा गया है)
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