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चीन के मिसाइल परीक्षण से किन देशों की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ी

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इसी महीने चीनी नौसेना ने दक्षिण प्रशांत महासागर में एक मिसाइल का परीक्षण किया। चीनी सरकारी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, एक परमाणु पनडुब्बी ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में मिसाइल दागी, जिसमें नकली हथियार (डमी वॉरहेड) लगा हुआ था। प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगियों ने इस परीक्षण की तुरंत कड़ी आलोचना की। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने कहा कि चीन का यह परीक्षण क्षेत्रीय सुरक्षा की स्थिति को अस्थिर करने वाला है। जापान ने चीन से अपने कदमों पर फिर से विचार करने के लिए कहा।
 
न्यूजीलैंड ने साफ कहा है कि वह नहीं चाहता कि चीन दक्षिण प्रशांत महासागर को अपनी मिसाइलों का टेस्टिंग ग्राउंड यानी परीक्षण क्षेत्र बनाए। वेलिंगटन में वहां के विदेश मंत्री विंस्टन पीटर्स ने कहा, "दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में चीन द्वारा परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइलों के परीक्षणों को लेकर हम बेहद चिंतित हैं।”
 
शीत युद्ध के दौरान, अमेरिका ने दक्षिण प्रशांत महासागर के बिकिनी एटोल के आसपास कई परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था, जो आज मार्शल आइलैंड्स का हिस्सा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ही, प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था पर अमेरिका का पूरी तरह से दबदबा रहा है। 
 
चीन के मिसाइल परीक्षण को लेकर क्या जानकारी सामने आई
चीन की बढ़ती सैन्य ताकत अब अमेरिका के इसी पुराने दबदबे को चुनौती दे रही है. हालांकि, चीनी सरकारी मीडिया ने इस परीक्षण के बारे में कोई खास जानकारी नहीं दी है, लेकिन वहां के राष्ट्रवादी मिलिट्री एक्सपर्ट्स चीनी सोशल मीडिया पर लगातार अंदाजा लगा रहे हैं कि यह मिसाइल कितनी ज्यादा ताकतवर रही होगी। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) नेवल मिलिट्री एकेडमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के रिसर्चर लेफ्टिनेंट कर्नल झांग जुनशे ने लिखा, "यह जुलांग (जेएल)-3 सीरीज की ऐसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल है जिसे पनडुब्बी से लॉन्च किया जाता है।” जुलांग-3 का मतलब है, ‘जायंट वेव-3' यानी विशाल लहर-3. इसे अभी भी विकसित किया जा रहा है. ऐसा कहा जाता है कि इस मिसाइल की अधिकतम रेंज (मारक क्षमता) 12,000 किलोमीटर है और यह अपने साथ एक से ज्यादा परमाणु हथियार ले जा सकती है. अब तक, 2018 और 2019 के बीच इसके तीन सफल परीक्षणों की खबरें आ चुकी हैं. झांग ने अपने ब्लॉग में लिखा, "इस मिसाइल का निशाना मोर्चे पर लड़ रहे सैनिक नहीं हैं, बल्कि कमांड सेंटर, सैन्य ठिकाने या बिजली और ऊर्जा से जुड़े बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे रणनीतिक ठिकाने हैं।”
 
माना जा रहा है कि ‘जायंट वेव-3' मिसाइल को टाइप 094 जिन-क्लास की परमाणु पनडुब्बी से लॉन्च किया गया था। 120 नाविकों के पूरे क्रू वाली यह 135 मीटर लंबी पनडुब्बी कम से कम 70 दिनों तक लगातार पानी के अंदर रह सकती है। फिलहाल, चीनी नौसेना के पास ऐसी छह पनडुब्बियां सेवा में हैं।
 
झांग ने कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस परीक्षण के लिए मॉडिफाइड की गई किसी पनडुब्बी का इस्तेमाल किया गया हो।
 
वाशिंगटन स्थित थिंक टैंक ‘न्यूक्लियर थ्रेट इनिशिएटिव' के मुताबिक, जिन-क्लास पनडुब्बियों के अलावा चीन के पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली अन्य 59 हमलावर पनडुब्बियां हैं. अपने बचाव के लिए डर पैदा कर रहा चीन
झांग ने आगे कहा कि इस हथियार का मुख्य मकसद बड़े स्तर पर डर पैदा करना है, ताकि दुश्मन हमला करने की हिम्मत न कर सके. उन्होंने लिखा, "भले ही चीन के बाकी सभी सैन्य हथियार पूरी तरह से तबाह या बेकार हो जाएं, फिर भी चीनी पनडुब्बी परमाणु पलटवार करने में पूरी तरह सक्षम होगी।”
 
सितंबर 2024 की शुरुआत में ही, चीन ने अपनी मुख्य भूमि से दक्षिण प्रशांत महासागर की तरफ एक इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाइल लॉन्च की थी, जिसमें डमी वॉरहेड लगा था। खबरों के मुताबिक, यह मिसाइल फ्रेंच पोलिनेशिया में पहले से तय किए गए एक इलाके में जाकर गिरी थी। उस समय, पिछले 40 से भी ज्यादा सालों में चीन का यह पहला ऐसा परीक्षण था, जहां उसने अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में इतनी लंबी दूरी की मिसाइल दागी थी. साल 2024 की तरह ही, चीन ने इस हफ्ते भी यह दावा किया कि सभी पड़ोसी देशों को इस परीक्षण के बारे में पहले से ही जानकारी दे दी गई थी और यह सैन्य अभ्यास किसी खास देश या निशाने को लक्ष्य बनाकर नहीं किया गया था. हालांकि, चीन प्रशांत क्षेत्र में बदलाव लाना चाहता है. अपने घर के ठीक बाहर अमेरिका और उसके सहयोगियों की भारी सैन्य मौजूदगी बीजिंग के लिए बड़ी चिंता का विषय है।
 
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) यह पक्का करना चाहती है कि अगर कोई उस पर पहला सैन्य हमला करे, तो वह उसका तगड़ा जवाब दे सके और वैसा ही पलटवार करे जो बीजिंग की नजरों में उचित जवाबी कार्रवाई हो। इसके साथ ही, परमाणु ताकत होने के नाते चीन ने यह वादा भी किया है कि वह कभी भी अपनी तरफ से पहला परमाणु हमला नहीं करेगा।
 
बर्लिन स्थित थिंक टैंक ‘श्टिफटुंग विसेनशाफ्ट उंड पोलीटिक (एसडब्ल्यूपी)' के एशिया रिसर्च ग्रुप के प्रमुख फेलिक्स हाइडुक ने 2024 में लिखा था, "चीन अभी कई स्तरों पर अमेरिका के नेतृत्व वाले क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को जोरदार तरीके से चुनौती दे रहा है.”।
 
उस समय जर्मन सेना प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना के नेतृत्व में एक अभ्यास में हिस्सा ले रही थी. जुलाई और अगस्त 2024 में पांच हफ्तों तक, 29 देशों ने 40 युद्धपोतों के साथ पर्ल हार्बर स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे के आस-पास अभ्यास किया था।
 

बढ़ रही चिंता

हाइडुक ने 2024 में लिखा था कि बीजिंग का मकसद एक ऐसी वैकल्पिक क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देकर अपना रणनीतिक लक्ष्य हासिल करना है, जो ‘एशियाई लोगों द्वारा और एशिया के लोगों के लिए' हो और जिसकी कमान चीन के हाथ में हो. इसके साथ ही, वह अमेरिका के नेतृत्व वाली मौजूदा व्यवस्था को ‘शीत युद्ध का अवशेष' बताता है.
 
इस रणनीति के तहत, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को फिर से हथियारों से लैस करना, द्विपक्षीय सुरक्षा साझेदारियों का विस्तार करना और दक्षिण चीन सागर के बड़े हिस्सों का सैन्यीकरण करना शामिल है. इन तमाम वजहों से, दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में भी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ रही हैं। ऑस्ट्रेलियाई थिंक टैंक ‘लोवी इंस्टीट्यूट' के सैम रोगेवीन और डेविड वैलेंस ने जून 2026 के एक अध्ययन में लिखा है, "ऑस्ट्रेलिया पर लंबी दूरी से हमला करने के लिए पीएलए (चीनी सेना) की मिसाइल फोर्स चीन का सबसे असरदार हथियार है. अगर इस क्षेत्र में कोई बड़ा युद्ध या टकराव होता है, तो उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में मौजूद तमाम सैन्य ठिकाने चीनी सेना के निशाने पर होंगे।”
 
अभी पिछले महीने ही, ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से मौजूद स्रोतों में ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि अगर चीन अपनी मुख्य भूमि से कोई मिसाइल दागता है, तो वह ऑस्ट्रेलिया के मुख्य भूभाग तक पहुंच सकती है. ऑस्ट्रेलिया के बड़े शहर पूर्वी तट पर स्थित हैं। सोमवार को दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में पनडुब्बी से किए गए मिसाइल परीक्षण के बाद स्थिति निश्चित रूप से बदल गई है.
 
तुर्की की राजधानी अंकारा में हुए शिखर सम्मेलन से इतर, महासचिव मार्क रुटे ने कहा कि यह परीक्षण नाटो के लिए भी एक संदेश था। उन्होंने कहा, "यह इस बात का एक और सबूत है कि हमें किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए... और हम हैं भी नहीं।”

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